आधुनिकतावाद और नारी शोषण

आधुनिकतावाद और नारी शोषण

विश्व की आधी जनसंख्या अर्थात् नारी के सम्मान, उसके अधिकारों पर बहुत बातें होती रहती हैं लेकिन इस बात को अनदेखा किया जाता है कि पिछले कुछ दशकों में नारी स्वतंत्रता के नाम पर वास्तव में नारी को गुमराह ही किया गया है। अनेक मामलों में यह भी देखा गया है कि जहां छोटी- छोटी घरेलू समस्याओं का दोनों पक्षों को समझा बुझा कर आसानी से समाधान संभव हो सकता है पर उसे आधुनिकतावादी बात का बतंगड़ बनाकर संबंध विच्छेदन को एकमात्र समाधान के रूप में प्रस्तुत करते हैं। यहां यह समझना जरूरी है कि केवल नारी नहीं, पुरुष को भी जीवन में अनेक समझौते करने पड़ते हैं। ऐसा कर न तो पुरुष और न ही नारी किसी पर अहसान करते हैं क्योंकि समन्वय ही जीवन है। जब प्रकृति का हर जीव परिस्थितियों के अनुसार समन्वय करता है तो मनुष्य उसका अपवाद क्यों होना चाहिए। यहां अभिप्राय हर्गिज नहीं कि केवल महिला ही समन्वय करे। स्वस्थ और समृद्ध सुखी समाज के प्रत्येक सदस्य को दूसरों का सम्मान करना चाहिए। बचपन से ही हम लड़के और लड़कियों दोनो का 'समन्वय' का महत्व बतायें ही नहीं बल्कि माता- पिता स्वयं भी अपनी जीवन शैली के रूप में उनके सम्मुख उदाहरण भी प्रस्तुत करें तो कोई कारण नहीं कि उनपर इस का प्रभाव न हो लेकिन दुर्भाग्य से होता यह है कि घर पर माता-पिता को बच्चों के लिए बहुत समय नहीं मिलता। स्कूल, स्कूल के बाद टयूशन, फिर टीवी और इधर इंटरनेट, नये आधुनिकतम मोबाइल की छोटे- छोटे बच्चों तक पहुंच उन्हें मानवीय संवेदनाओं से लगातार दूर कर रही है। वे आत्म केन्द्रित होकर जीना सीख रहे हैं। लगभग सभी टीवी चैनलों के विज्ञापनों से धारााहिकों तक कहीं भी सभ्यता, संस्कृति, ससम्मान, संस्कार की छाप दिखाई नहीं देती। अर्धनग्न विज्ञापन, विज्ञापनों में अनावश्यक रूप से नारी देह का चित्रण क्या नारी सम्मान हैं? नारी सम्मान उसे शिक्षा के साथ- साथ संस्कारों से जोडऩे में है। नारी सम्मान उसे हर बात पर आक्र ामक बनाने में नहीं, केवल गलत के विरूद्ध सख्त होना सिखाने में है। आज विभिन्न फिल्मों से धारावाहिकों में प्रेम के नाम पर जिसस तरह की विकृति परोसी जा रही है। क्या यह मार्ग स्थायी नारी सम्मान की ओर जाता है? जो लोग समझते है कि वैश्वीकरण, औद्योगीकरण, नगरीकरण तथा आधुनिकीकरण के नाम सहजीवन (लिव इन रिलेशन) नारी का सम्मान है, वे वास्तव में नारी के शोषक हैं जो बिना किसी जिम्मेवारी के अधिकतम दुरूपयोग करना चाहते हैं। इससे प्रत्येक नारी विशेष रूप से युवा लड़कियों को जागरूक करने की आवश्यकता है। यदि नारी को वास्तव में सशक्त करना है तो उसे शिक्षा के साथ संस्कार चाहिए। जागरूकता के साथ समन्वय चाहिए। केवल नारे नहीं, दहेज और आडम्बर के विरूद्ध नारी जागरण ही समाज को नई दिशा दे सकता है।

- ज्योति सेतिया

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