दिल खोलकर करें मन की बात

दिल खोलकर करें मन की बात

रमा की परीक्षाएं समाप्त हो चुकी थीं। आजकल वह अपने पापा के साथ उनके क्लीनिक पर चली जाती है। उसने अपने पापा में एक खास बात देखी, फिर रात को डाइनिंग टेबल पर पूछा, पापा, आप मरीजों से पूरा ब्यौरा क्यों लेते हैं। आप बोर नहीं होते।'

नहीं, यह तो मेरा अपना अंदाज है। मरीज जब अपना दुख बयान करता है तो उसका मन हल्का हो जाता है, साथ ही उसे तसल्ली हो जाती है कि डॉक्टर ने उसकी बात ध्यान से सुनी। इससे इलाज करने में मदद मिल जाती हैं। पापा ने मुस्कुराते हुए कहा।

ऊपर का उदाहरण यही बताता है कि मन की बात करना लाभकारी होता है। जो लोग अपनी समस्याएं किसी से खुलकर शेयर नहीं करते, वे तनाव में रहते हैं। यह भी एक प्रकार का 'ईगो' है जो खतरनाक हो सकता है। भीतरी दबाव या तनाव जब सघन हो जाता है तो यह किसी न किसी रूप में फूट पड़ता है। व्यक्ति पागल हो जाता है या फिर आत्महत्या करने की सोचता है।

वैसे भी देखने में आया है कि भावुक किस्म के साहित्यकार, कवि या कलाकार अक्सर आत्महत्या कर लेते हैं। बहुत ज्यादा एकान्तवास और खुलकर मन की बात न करने से ही ऐसे परिणाम सामने आते हैं। इसके विपरीत अनभुवों में जीने वाले लोग हंसते हुए नजर आते हैं। इसका एक ही कारण है कि टोलियों में बैठकर एक दूसरे को अपना सुख-दुख सुनाते रहते हैं।

ज्यादा और व्यर्थ बोलना, ढिंढोरा पीटना गलत है पर अपनी समस्या अथवा दिल का हाल किसी करीबी से शेयर करना गलत नहीं। ऐसा न करने से समस्याग्रस्त व्यक्ति मन ही मन घुलने लगता है। छोटी से छोटी और व्यर्थ सी बात भी उसके मस्तिष्क में घर कर जाती है और उसे निरंतर परेशान करती रहती है। परिणामस्वरूप उसका ध्यान उपयोगी कार्यों से हट जाता है, उसकी एकाग्रता भंग हो जाती है। अत: मानसिक स्वास्थ्य के लिए खुलकर बात करना आवश्यक है।

-हरदेव कृष्ण वर्मा


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