क्या आपका विवाह होने वाला है

क्या आपका विवाह होने वाला है

शादी का अर्थ है दो अलग-अलग जिंदगियों या दो व्यक्तियों का मेल। कहते हैं कि यह रिश्ता स्वर्ग से बनता है। फिर भी कुंडलियां मिलाई जाती हैं, इश्तहार दिए जाते हैं। काफी भाग-दौड़ होती है। वर वधू की तलाश में अपना निजी फैसला कर लेते हैं पर अधिकतर लोग अपने माता-पिता के फैसले को ही मान कूद पड़ते हैं विवाह कुंड में।

ऐसे में दिल मिल जाएं तो अपना भला, घर का भला नहीं तो लोगों का भला जिन्हें नित नया तमाशा बिना टिकट देखने को मिल जाता है।

यह प्रश्न इसलिए पैदा हुआ कि आजकल विवाह केवल मजाक बन कर ही तो रह गया है जिसमें गलती सिर्फ एक पक्ष की नहीं बल्कि दोनों पक्षों की होती हैं। वर यानी लड़का अथवा वधू यानी लड़की, दोनों अपने अपने सपने सजाते हैं और कल्पना को ही हकीकत में पाना चाहते हैं। जब ये कल्पनाएं साकार नहीं होती तो समस्त कुंठाएं विवाद का रूप ले लेती हैं।

जैसे एक लड़का कल्पना करता है सीधी-सादी लड़की जो फैशनपसंद हो। ऐसे में लड़का जरूर रोक टोक करेगा और लड़की इतनी आसानी से मानने वाली नहीं क्योंकि कुछ लड़कियां जिद्दी स्वभाव की होती हैं और लड़के भी। ऐसे में दोनों अपनी अपनी बात एक दूसरे पर थोपते हैं और कोई भी समझौते को राजी नहीं होता।

अब दोष किसको दिया जाए कल्पनाओं को या हकीकत को। जब विवाह हो ही गया, फिर कल्पनाओं का क्या काम। ऐसे में लड़के-लड़की का फर्ज है आपस में एक दूसरे की आदतों को समझ लें और एक दूसरे के अरमानों की कदर करें। तभी जिंदगी सुखमय बन पाएगी।

विवाह से पूर्व ही अपने को तैयार कर कल्पनाओं को छोड़ हकीकत से समझौता कर लें तो अच्छा है क्योंकि वह लड़की जो विवाह के बाद दूसरे माहौल में जाती है, कुछ समय तक अपने को बिलकुल अकेली पाती है। ऐसे में यदि पति का सहयोग न मिले तो वह मन से टूट जाती है और शायद फिर संभल नहीं पाती और अक्सर टकराव होता रहता है और लड़की का फर्ज भी हो जाता है कि वह जैसे माहौल में जाए, वैसे ही स्वयं को ढाल ले।

वर को या वर पक्ष को यह कल्पना नहीं करनी चाहिए कि सिर्फ अपनी ही बात मनवाएं। हर ढंग उनके जैसा हो। कुछ बदलाव उनमें भी आना चाहिए यानी थोड़ा आप आगे बढ़ें, कुछ वो, थोड़ा आप मानें, थोड़ा वे। तभी तो गाड़ी चलेगी। यदि ऐसा न हो तो गाड़ी पटरी से उतर अलग-थलग हो जाएगी।

आप लड़की की भावनाओं की कदर करें, उसकी बात को मानें, तभी ़अपेक्षा करें कि वह आपकी भावनाओं की कदर करेगी और बात मानेगी। हमें एक दूसरे पर अपनी इच्छाएं भी नहीं लादनी चाहिए। सिर्फ समझ एवं आपसी समझौते से ही विवाह को सुखमय बनाया जा सकता है।

इस प्रकार शादी का बंधन मधुर हो पाएगा अन्यथा कड़वाहट से भर नीरस हो जाएगा। शादी कीजिए, बरबादी नहीं, घर बसाइए, बिगाड़ें नहीं। प्यार से सजाएं, संवारें। उसे आपसी मनमुटाव या जिद में नष्ट न करें। विवाह दो आत्माओं का मेल ही रहे, टूटन नहीं।

- मीनाक्षी सुकुमारन

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