बेचारा पति

बेचारा पति

क्या कभी किसी ने यह सोचा है कि घर-परिवार चलाने की जिम्मेदारी क्या सिर्फ पुरूष की होती है? क्या पत्नी का कोई कर्तव्य नहीं? यह गहराई से क्यों नहीं सोचती कि पत्नी को उतने ही पैर पसारने चाहिए जितनी बड़ी उसकी चादर हो।

इसका अर्थ यह है कि परिवार की मासिक आमदनी के अनुसार ही घर का बजट बनाया जाना चाहिए तथा खर्चों को प्राथमिकता के हिसाब से करना चाहिए। घर की जरूरी आवश्यकताओं को पहले पूरा करने का प्रयत्न करना चाहिए। उसके बाद विलासिता वाली आवश्यकताओं को पूरा करने पर विचार करना चाहिए।

अधिकांश पत्नियां अपने पतियों की मासिक कमाई से संतुष्ट नहीं रहती। अक्सर पत्नी अपने पति को उसकी कम कमाई का ताना देती ही रहती हैं। दूसरों के पतियों से अपने पति की तुलना करती रहती है। इससे दूसरों के सामने उसे छोटा साबित करने का प्रयास करती है।

यदि पति सच्चा है तथा शराब तथा अन्य नशीले पदार्थों का सेवन नहीं करता, जुआ नहीं खेलता, तब भी उन्हें उससे क्यों शिकायत रहती है, यह बात किसी के गले नहीं उतरती।

पत्नी अपने पति को सलाह देने से बाज नहीं आती। वह अक्सर कहती है कि उसका पति वर्तमान काम-धंधा छोड़कर कोई दूसरा आमदनी बढ़ाने का धंधा क्यों नहीं करता ताकि अधिक कमाई करके अपने परिवार का जीवन स्तर ऊंचा उठ सके।

अगर पति शराबी, जुआरी या मादक पदार्थों का सेवन करने वाला हुआ, तो भी उसे अपने पति से शिकायत रहती है। वह कहती है कि उसका पति अपनी कमाई का एक बड़ा भाग अपने ऊपर खर्च कर देता है और परिवार का ख्याल नहीं रखता।

इन सबसे यही साबित होता है कि भारतीय पत्नियां अपने पतियों से कभी संतुष्ट नहीं होती। शादी के कुछ वर्षों बाद प्यार समाप्त हो जाता है तथा उसका स्थान पारिवारिक कलह ले लेती है।

- एस.के. त्रिपाठी

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