किशोर होते बच्चों को दें सही सलाह

किशोर होते बच्चों को दें सही सलाह

किशोरावस्था जीवन का वह पड़ाव है जहां से बच्चों का भविष्य बनता या बिगड़ता है। दस-बारह साल की उम्र में बच्चा स्वयं को एक जिम्मेदार व्यक्ति समझने लगता है लेकिन कभी-कभी वह वातावरण को सही तरीके से नहीं समझ पाता और गलतियां कर बैठता है। बाद में वह स्वयं को असफल और अयोग्य समझने लगता है। उसका आत्मविश्वास और स्वयं के प्रति आस्था भी कम होने लगती है। ऐसे समय में माता-पिता को धैर्य और समझदारी से काम लेना चाहिए।

तेरह से अठारह वर्ष के बीच किशोर मन में संस्कार परिपक्व होने लगते हैं। इस उम्र में उलझनें भी बढ़ती हैं। वह सभी कार्य जल्दी-जल्दी करना चाहता है और कुछ बनकर दिखाना चाहता है क्योंकि नये रक्त में बहुत उमंग और जोश होता है किंतु ज्ञान और अनुभव की कमी के कारण बच्चा अक्सर गलती कर बैठता है। ऐसे समय में मां-बाप का यही फर्ज है कि उसे संभालें और प्यार-सत्कार को कम न होने दें। बालक-बालिकाओं के मन में अज्ञात भय का साया न पडऩे दें। इससे माता-पिता और बच्चों के बीच आस्था और मधुरता बनी रहेगी।

कई बार अपनी उम्र के लड़के-लड़कियों को बेहिसाब खर्च करते, मस्ती करते या शैतानी करते देख वह भी नकल करने लगता है। ऐसे समय में माता-पिता अपने बच्चों को अपनी परिस्थिति का सही ज्ञान करायें तथा बच्चों को संयमी व मितव्ययी बनने की सलाह दें ंकिंतु दबावपूर्वक नहीं अपितु प्यार से।

बच्चों की गलतियों पर डांट-फटकार उचित नहीं। ऐसे में बच्चा आपको गलत समझ बैठता है और आपके प्रति गलत धारणा तथा अनास्था अंतत: उसे स्वयं के प्रति भी गलत सोचने-मानने पर विवश कर देती है।

माता-पिता चाहे शिक्षित हों अथवा निरक्षर, बच्चों को पढऩे-लिखने, आगे बढऩे का अवसर अवश्य दें। खासतौर पर लड़कियों को पढ़ाना-लिखाना समय की मांग है। इसी प्रकार किशोर होते बच्चों के काम विषयक प्रश्नों का उचित समाधान भी करना चाहिए। घरेलू चिकित्सक, नर्स या नजदीकी रिश्तेदार यह दायित्व निबाहें। सैक्स का सही ज्ञान नहीं होने से बच्चे गलत संगत में पड़कर अपना जीवन और यौवन नष्ट कर लेते हैं।

बेटी जब किशोरावस्था में प्रवेश करे तो मां को चाहिए कि उसे मासिक धर्म की सही जानकारी दें तथा आवश्यक सावधानी बरतने की सलाह दें। शर्म-संकोच में आपकी-बेटी किसी रोग से ग्रस्त हो सकती है। शर्म के कारण कई बार लड़कियां अपनी बातें नहीं कह पाती। मां को चाहिए कि वह अपनी बेटी से सहेली जैसा बर्ताव करे।

पन्द्रह से अठारह वर्ष की उम्र में किशोरों के मन में काम वासना की तरंगें उठती हैं। उन्हें मार्गदर्शन अवश्य रूप से देना चाहिए। अपने किशोर होते बच्चों को उचित सलाह देकर माता-पिता न केवल उन्हें सभ्य और स्वस्थ नागरिक बना सकते हैं अपितु समाज और राष्ट्र को उन्नत बनाने में अपना बहुमूल्य योगदान भी दे सकते हैं।

स्मरण रहे समाज को सभ्य और भव्य बनाना आपका कर्तव्य है।

-पं. घनश्याम प्रसाद साहू

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