उपहार लेना भी कला है

उपहार लेना भी कला है

उपहार लेने देने की परम्परा बहुत पुरानी चल रही है। उपहार लेना सभी को अच्छा लगता है लेकिन देना किसी-किसी को ही पसंद है। यह भी एक तरह का शौक है। उपहार लेना देना कोई लालच नहीं बल्कि मधुर भावनाओं का आदान प्रदान होता है।

उपहार कितना भी छोटा क्यों न हो, उसे प्यार से स्वीकार करना चाहिए जिससे देने वाले का मान बढ़े और उसे प्रसन्नता हो। यदि आप इसके विपरीत नाक भौं सिकोड़ कर गिफ्ट लेंगी तो देने वाले का दिल तो टूटता है। साथ ही आपके प्रति उसके मन में इज्जत भी नहीं रहती।

कई बार देखा गया है कि कई लड़कियां यह उम्मीद बांध कर रखती हैं कि उनके जन्मदिन पर उनकी सहेलियां उन्हें क्या देंगी। मान्या को मैंने एक लिपस्टिक दी तो उसने इतनी प्रसन्नता से उसे स्वीकार किया और कहा, 'मेरे पास यही शेड नहीं था, अच्छा हुआ तुमने दिया। उसकी खुशी देखकर मेरा मन भी रोमांचित हो गया।

इसके विपरीत श्रुति को इतना अच्छा पर्स दिया तो उसने कहा 'पर्स देने की क्या जरूरत थी। यह तो मेरे पास पहले से ही था। इससे अच्छा तो तुम मुझे स्वेटर दे देती।

उसके इस व्यवहार से बहुत ठेस पहुंची। किसी को यदि उपहार पसंद न भी आए तो उसे उस समय स्वीकार कर लेना चाहिए चाहे थोड़े दिनों बाद ही वह यह बात नजाकत के साथ कही जा सकती है। यदि किसी के बहुत करीब हैं तो आप उससे पूछ लें कि उसको क्या चाहिए। इससे दोनों तरफ का मान रहता है। उपहार सबके सामने खोलना, उसका मूल्य देखना कि सस्ता है या महंगा, यह भी एक तरह का घटियापन है। ध्यान रहे, उपहार कोई बोझ नहीं वरन् प्रेम व भावनाओं का प्रतीक है।

- शैली माथुर

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