सैक्स पर समाज का बदलता नजरिया

सैक्स पर समाज का बदलता नजरिया

धीरे-धीरे ही सही, समाज के कई बंद पहलू खुल रहे हैं। बंद कमरे में तंग बिस्तर पर होने वाली अंतरंग बातें पहले जैसी गोपनीय नहीं रही। सैक्स, विवाहेत्तर संबंध और चरम सुख जैसे नितांत निजी विषयों पर भी चर्चा हो रही है।

पश्चिमी देशों के मुकाबले भारत का पारंपरिक समाज एक बंद समाज माना जाता रहा है। सैक्स जैसे विषयों पर चर्चा से ही सामाजिक मान्यता टूटने की आशंका जाहिर कर दी जाती थी। हालांकि घरवाली और बाहरवाली जैसी व्यवस्था हमारे समाज में भी हमेशा से रही थी मगर ढके हुए ढंग से। समाज में मर्द अपनी तरह से सैक्स को परिभाषित करते रहे थे मगर अब वर्जनाएं टूट रही हैं। महिलाएं भी सैक्स और चरम सुख जैसे विषयों पर राय जाहिर करने लगी हैं।

उदारीकरण के दौर से गुजर रहे समाज में बदलाव भी हो रहे हैं। अब लड़कियां खुलकर लड़कों से न केवल दोस्ती कर रही हैं वरन् शारीरिक संबंधों को भी स्वीकार कर रही हैं। उन्हें इस बात को बताने से भी संकोच नहीं रहा कि शादी के पहले उन्होंने कितनी बार शारीरिक संबंध बनाये। उन्हें 'सैक्सीÓ जैसे शब्द आत्मसम्मान का प्रतीक लगते हैं। जाहिर है, सैक्स पर सोच चढ़ाव पर है।

भारतीय युवा वर्ग आज के दौर में खुलेपन पर सबसे ज्यादा सक्रिय है। मैट्रो शहरों को छोड़ भी दें तो छोटे शहरों में भी ब्वाय फ्रेंड 'स्टेटस सिम्बलÓ सा बनता जा रहा है। युवाओं में भी गर्लफ्रेंड के प्रति आग्रह तेजी से बदलता जा रहा है। एक तरह से गर्लफ्रेंड की संख्या स्मार्ट होने का पैमाना बन गया है। विदेशों से आयातित वस्तुओं के साथ पश्चिमी संस्कृति के साथ भी तालमेल का दायरा निश्चित रूप से बढ़ा है।

सैक्स को शुचिता का मापदंड मानने वाले कम हो रहे हैं। पति के साथ ही अच्छा-बुरा समझने वाली भारतीय महिलाएं भी अपने लिए यौन सुख के मायने तलाशने लगी हैं। पति नहीं तो दूसरे की तलाश जैसे विकल्प भी खुल रहे हैं। भारतीय मर्द हालांकि पहले भी बाहर वाली का चक्कर लगाया करते थे मगर अब उनमें भी समाज से लडऩे का दमखम दिखने लगा है।

कहा जा सकता है कि प्रौढ़ता की तरफ बढ़ती पारंपरिक भारतीय स्त्रियों में सैक्स के प्रति उदासीनता से उपजे इस विवाद ने यह बहस छेड़ दी है कि दांपत्य संबंधों के लिए सैक्स कितना जरूरी है? वैसे राजस्थान के एक न्यायालय ने भी माना था कि किसी भी स्त्री को यौन इच्छा की पूर्ति किए बिना रखना सजा के समान है।

समाज में वर्षों से जारी रूढि़वादिता और सैक्स के नाम से ही बिदकने वाले समाज में कई स्तरों पर मंथन चल रहा है। कुछ बदलाव के साथ बदल भी रहे हैं तो कुछ पुरानी मान्यताओं और नये अनुभवों के बीच भी फंसे हैं।

कहना साफ है कि विवाहेत्तर संबंधों की चाहत हमेशा से रही है और यह प्राकृतिक है। पुरानी कहावत Óअपना बच्चा और दूसरे की पत्नी हमेशा अच्छी लगती है', इस मान्यता को ही पुख्ता करते हैं। इससे जाहिर होता है कि हमेशा से ही हमारे समाज में इन संबंधों के प्रति आर्कषण रहा है मगर सार्वजनिकता से बचते हुए।

समाज में बदलाव के इस दौर में हालांकि सब कुछ नया-नया दिखता है मगर बदलाव के खतरे भी हैं। रूढि़वादिता को तोडऩा एक विषय हो सकता है मगर उन्मुक्त सैक्स का आकर्षण भी आयातित संस्कृति का ही हिस्सा है। प्रगाढ़ संबंधों वाली भारतीय संस्कृति की जगह पश्चिमी संस्कृति के सैक्स को प्रधानता देने से परिवारों के टूटने का भी खतरा है। जाहिर है, बदलाव से इनकार नहीं किया जा सकता मगर अंधानुकरण खतरनाक हो सकता है।

- राजा पप्पू कुमार

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