सुलझाता नहीं, उलझाता है तलाक

सुलझाता नहीं, उलझाता है तलाक

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार भारत में तलाकों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही है। गति भी अब धीमी नहीं रही। वह व्याधि अब मध्यम वर्ग के उन परिवारों तक भी आ पहुंची है जिन्हें बुनियादी तौर पर परंपरावादी माना जाता रहा है। सामाजिक बदलाव, कुछ हद तक नारी शिक्षा के फलस्वरूप महिला जागृति, कामकाजी महिलाओं की बढ़ती संख्या, और सब से बढ़ कर सुलभ हुए तलाक के वैधानिक अधिकार ने स्त्रियों में भी इस प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है।

इसी से पारिवारिक बिखराव में बढ़ोत्तरी और पति-पत्नी के बीच परंपरागत आपसी सदभाव एवं सामंजस्य में कमी हुई है। जो चीज सहज प्राप्य हो, उसकी ओर मन विचलित तो होता ही है, अब अन्य विकल्प गौण हो जाते हैं मगर क्या तलाक ही वैवाहिक झगड़ों का सही इलाज है। क्या सिरदर्द के निवारण के लिए सिर को ही काट फेंकने को बुद्धिमत्ता कहा जा सकता है।

दो भिन्न परिवारों और परिवेशों से आए व्यक्तियों के विचारों, स्वभाव, आचार-व्यवहार, मानसिकता आदि में अंतर होना तो नितांत स्वाभाविक ही है। विवाहोपरांत प्रारम्भिक भावनात्मक उफान के उतार के बाद एक दूसरे में कई त्रुटियां, कमियां भी नजर आने ही लगती हैं मगर आपसी सूझबूझ, तालमेल, समझदारी से उन का निवारण भी किया जा सकता है और उन्हें नजरअंदाज भी। समझौते, सहयोग, सहिष्णुता, सामंजस्य, और आपसी विश्वास का ही तो दूसरा नाम है विवाह। तलाक की स्थिति वहां निर्मित होती है जहां आपसी अहं टकराते हैं।

वैवाहिक जीवन में यह याद रखना आवश्यक है कि कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है। पत्नी के गरिमामय पद की उपलब्धि नारी के लिए सम्मान और गौरव का प्रतीक है। उस की प्राप्ति व निर्वाह के लिए कुछ त्याग तो करना ही होगा। इस में सर्वोपरि है अपने व्यक्तित्व में आवश्यक बदलाव। यूं भी व्यक्ति को जीवन में सफल होने के लिए परिस्थितियों एवं परिवेश की आवश्यकताओं और अनिवार्यताओं के अनुरूप स्वयं को ढालना ही पड़ता है, समझौता करना ही पड़ता है। दांपत्य जीवन में तो यह और भी अधिक आवश्यक है।

तलाक से क्या समस्या सुलझ जाती है। कतई नहीं, वरन कई और व्यक्तिगत, सामाजिक, पारिवारिक, मनोवैज्ञानिक समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं। समाजशास्त्रियों ने विस्तृत अध्ययन के बाद निष्कर्ष निकाला है कि तलाक की विभीषिका व्यक्तित्व को आहत एवं मानसिकता को कुण्ठित एवं दूषित कर देती है। 'तलाकशुदाÓ का लेबल आज भी हमारे समाज में नक्कू ही बना देता है - विशेषकर स्त्रियों को। उनके बारे में सामान्य धारणा विकृत और पुरूष वर्ग की सोच ओछी बन जाती है। उन की सहज अस्मिता और प्रतिष्ठा पर प्रश्न चिन्ह लग जाता है। तलाक के परिणामस्वरूप स्त्री ससुराल से तो कट ही जाती है, मायके में भी अवहेलना और अनादर की पात्र हो जाती है।

बच्चे या बच्चों की समस्या तो और भी गंभीर होती हैं। पहले उनके संरक्षण को लेकर दोनों पक्षों में अदालती खींचतान, तदुपरांत उन में घर करती असुरक्षा की भावना, सर्वाधिक पीड़ा तो इन निर्दोषों को झेलनी पड़ती है, वह भी जीवन भर। किसी भी दृष्टिकोण से देखें तलाक से एक समस्या चाहे सुलझे या न सुलझे, दस नई और अधिक गंभीर अवश्य उत्पन्न हो जाती है।

तलाक वैवाहिक झगड़ों का सही इलाज नहीं है। दांपत्य जीवन में समय-समय पर कड़वाहट, कुण्ठा, कष्ट,कठिनाइयों के अवसर तो आते ही हैं, मनमुटाव भी होता ही है किंतु उन्हें धैर्य, समझदारी, आपसी तालमेल से सुलझाना ही श्रेयस्कर है, तलाकोन्मुख हो कर नहीं। दोनों परिवारों के बड़े-बूढ़े इस में बहुत सहायता कर सकते हैं।

- ओम प्रकाश बजाज

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