दहेज-औरत ही रोक सकती है

दहेज-औरत ही रोक सकती है

पापा, पांच लाख नहीं, आप दस लाख रूपया मांगो। रमन के बेटे प्रवीन की रेलवे में नौकरी लग चुकी थी। उसके रिश्ते के लिए लड़की के पिता आए हुए थे। उसने बता दिया था वह शादी कैसी करेगा।

लेकिन लड़की के पिता द्वारा की गई पेशकश से रमन की बेटी प्रमिला खुश नहीं थी। उसने अपने पिता से कहा था कि वह ज्यादा दहेज की मांग करें।

दहेज की प्रथा पुरानी है। बेटी की शादी करते समय पिता द्वारा वर को दहेज दिया जाता है। दहेज में नगद रूपये, जेवरात व अन्य सामान दिया जाता है। हर पिता चाहता है वह अपनी बेटी को अपनी सामथ्र्य के अनुसार दहेज दे।

लेकिन आजकल लड़के वाले लड़की के पिता द्वारा दिये जाने वाले दहेज से संतुष्ट नहीं होते। लड़की का पिता जितनी पेशकश करता है, लड़के का पिता उससे ज्यादा मांग करता है। उस मांग के पीछे भूमिका निभाती है लड़के की मां, बहन या परिवार की कोई अन्य औरत।

बहू अगर दहेज कम लेकर आती है तो उसे सास, ननद, देवरानी, जेठानी ही ताने मारती हैं बहू को तंग करती हैं और कहीं कहीं उसकी हत्या भी कर देती हैं।

दहेज की प्रथा को जड़ मूल से तो नष्ट नहीं किया जा सकता। यह प्रथा सदियों से प्रचलित है लेकिन लड़की के पिता की हैसियत से ज्यादा पैसा मांगना और अगर दहेज में कमी रह जाये तो बहू का उत्पीडऩ करना या उसकी हत्या करना निन्दनीय और गलत है।

दहेज की प्रथा को कम किया जा सकता है। दहेज कम लाने पर बहू को परेशान करने से बचाया जा सकता है। उसके लिये औरतों को अपनी सोच में अंतर लाना होगा। सास, ननद को चाहिये वे बहू को दहेज कम लाने पर तंग न करें। उन्हें सोचना चाहिये कि बहू भी उनकी तरह एक औरत है।

औरतों की सोच में अंतर आयेगा, एक औरत दूसरी औरत को अपना जैसा समझेगी, तभी दहेज प्रथा पर काबू पाया जा सकता है।

- किशन लाल शर्मा'

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