आदतों के गुलाम न बनें

आदतों के गुलाम न बनें

जिन कामों या बातों को व्यक्ति दुहराता रहता है, वे स्वभाव में शामिल हो जाती हैं और आदतों के रूप में प्रकट होती हैं। कई लोग आलसी प्रवृत्ति के होते हैं। वैसे जन्म से दुर्गुण लेकर कोई पैदा नहीं होता। अपनी गतिविधियों में इस प्रवृत्ति को शामिल कर लेने और उसे बार-बार दुहराते रहने से अभ्यास बन जाता है। यह पूरा क्रिया कलाप ही अभ्यास बनकर इस प्रकार आदत बन जाती है मानो वह जन्मजात ही हो। वस्तुत: यह अपना ही कार्य होता है जो कुछ ही दिन में बार-बार प्रयोग से मजबूत होकर आदत बन जाता है।

जिस प्रकार बुरी आदतें अभ्यास में आते रहने के कारण स्वभाव बन जाती हैं और फिर छुड़ाए नहीं छूटतीं, वही बात अच्छी आदतों के संबंध में है। हँसते-मुस्कुराते रहने की आदत ऐसी ही है। उसके लिए कोई महत्त्वपूर्ण कारण होना आवश्यक नहीं।

आमतौर से सफलता या प्रसन्नता के कोई कारण उपलब्ध होने पर ही चेहरे पर मुस्कान उभरती है किंतु कुछ दिन बिना किसी विशेष कारण के भी मुस्कुराते रहने की स्वाभाविक क्रियाएं करते रहने पर वैसी आदत बन जाती है। फिर उसके लिए किसी कारण की आवश्यकता नहीं पड़ती और लगता है कि व्यक्ति कोई विशेष सफलता प्राप्त कर चुका है। साधारण मुस्कान से भी सफलता मिलकर रहती है। क्रोधी स्वभाव के बारे में भी यही बात है। कई व्यक्ति अनायास ही चिड़चिड़ाते रहते देखे जा सकते हैं। अपमान, द्वेष या आशंका जैसे कारण रहने पर तो क्रोध करने, चिड़चिड़ाने की बात समझ में आती है पर आश्चर्य तब होता है जब कोई प्रतिकूल परिस्थिति न होने पर भी लोग खीजते, झल्लाते, चिड़चिड़ाते देखे जाते हैं। यह और कुछ नहीं, उसके कुछ दिन के अभ्यास का परिणाम है। आदतों को आरंभ करने में तो कुछ प्रयत्न भी नहीं करना पड़ता। बाद में वे बिना किसी कारण के भी चलती रहती हैं। इतना ही नहीं, कई बार तो ऐसा भी होता है कि व्यक्ति आदतों का गुलाम हो जाता है और कोई विशेष कारण न होने पर भी उचित अनुचित आचरण करने लगता है। बाद में स्थिति ऐसी बन जाती है कि उस आदत के बिना काम ही नहीं चलता। बुरी आदत वाले लोगों को प्राय: सभी नापसंद करते हैं और उन पर तरह-तरह की टिप्पणी भी करते हैं पर आदत से मजबूर व्यक्ति को यह महसूस ही नहीं होता कि उसने कोई ऐसी आदत पाल रखी है जिसे लोग नापसंद करते हैं और बुरा मानने लगते हैं। अच्छी आदतों के संबंध में भी यही बात है। अच्छी आदतें जहां लोगों से सहज श्रेय दिलाती हैं वहीं अपने व्यक्तित्व का वजऩ भी बढ़ाती हैं। तिनके-तिनके इकटठे करने पर मोटा व मजबूत रस्सा बन जाता है। अच्छी या बुरी आदतों के संबंध में भी ऐसी ही बात है। जिस प्रकार की आदत व्यक्ति का अंग बनेगा, समूचा व्यक्तित्व भी उस सांचे में ढलता चला जाएगा। अच्छी आदतों का अभ्यास किया जाय तो व्यक्तित्व श्रेष्ठ तथा आकर्षक बन जाता है। दूसरों के मन में अपने लिए सम्मानजनक स्थान बना लेता है। उसे सभ्य या शिष्ट माना जाता है। लोग उसके कार्यों में सहयोग करने लगते हैं या अवसर मिलते ही अपना सहयोगी बना लेते हैं। इस प्रकार अच्छी आदतें अपना हित ही करती हैं। इनका देर-सबेर उपयोगी लाभ मिलता ही है। उसके विपरीत बुरी आदतों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से निकट भविष्य में हानि ही हानि उठाने का अवसर आता रहता है।

- उमेश कुमार साहू

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