प्यार को खेल न समझें

प्यार को खेल न समझें

प्यार या प्रेम क्या है? यह क्यों उठता है? इन विषयों पर सदियों से अनुसंधान होता चला आ रहा है, सदियों से लिखा जा रहा है परन्तु अभी तक शब्दों के रूप में इसकी अभिव्यक्ति नहीं हो पायी है क्योंकि प्रेम अनुभव करने की वस्तु है न कि अभिव्यक्ति की।

प्यार एक भावना है जिसका नामकरण प्यार करने वालों की क्रिया के अनुरूप ही होता है। प्यार किया नहीं जाता, हो जाता है क्योंकि एक दिल से जब दूसरे दिल के मिलन का संयोग उपस्थित हो जाता है, उस अवसर पर प्यार की डोर अपने-आप ही बढऩे लगती है और दूसरे दिल के करीब जाकर ही क्षणिक विश्राम लेती है। प्यार का मिलन संगम कहलाता है और संगम ही प्यार की चरम सीमा होती है।

प्यार पाने के लिए अपने अंदर की प्यार भावना को जागृत करना होता है क्योंकि प्यार खरीदने व बेचने की वस्तु नहीं होती। छीनने या अधिकार जताने से भी प्यार को प्राप्त नहीं किया जा सकता। यह तो सिर्फ विश्वास के बल पर ही प्राप्त किया जा सकता है।

प्यार का प्रमुख क्षेत्र अधिकांशत: घर-परिवार ही होता है। इसके अतिरिक्त आस-पड़ोस, स्कूल, कॉलेज आदि सार्वजनिक जगहों पर भी मेल-मिलाप से स्त्री-पुरूष एक दूसरे की ओर आकर्षित होते हैं और स्वस्थ मित्रता की ओर हाथ बढ़ाने की भावना से करीब आते-जाते हैं परन्तु पाश्चात्य सभ्यता और फिल्म विज्ञापनों के द्वारा मन पर लादे गये वासना की दुर्गन्ध से प्यार की सुगंध सुगन्धित होने की बजाय कुत्सित होने लग जाती है और 'सेक्स भावना की ओर बहाकर ले जाती है।

प्यार पाने की कोशिश उस वक्त एक अहम् आवश्यकता बन जाती है जहां पर बच्चे को अपने बचपन से जवानी तक के सफर में अर्थात् घर की चारदीवारी के मध्य मिलने वाले प्यार का सहारा न मिला हो। तब ऐसा व्यक्ति घर की चार दीवारी से निकलकर अपने लिए प्रेमी की तलाश में किसी का भी हाथ थामने पर मजबूर हो जाता है। 'सेक्स' के संभावित खतरों को ध्यान में रखते हुए भी हमारा समाज आज किसी स्त्री को किसी पुरूष से स्वस्थ मित्रता करने पर भी संदेह से देखता है।

प्यार रूपी शीशे पर विकृति की अगर हल्की-सी भी चोट पहुंच जाती है तो वह प्यार रूपी शीशा फिर न जुडऩे के लिए चटख जाता है या चूर-चूर हो जाता है। प्यार का संबंध शारीरिक तृप्ति रूपी वासना से जब जुड़ जाता है तो वह मात्र अविश्वास और असम्मान को ही जन्म देता है। किसी भी स्त्री की सहमति के बिना शारीरिक तृप्ति पाना या फिर उसकी मानसिक भावनाओं का अनादर कर तिरस्कार करना, प्रेम नहीं बलात्कार कहलाता है भले ही वह अपनी विवाहिता-स्त्री के साथ ही क्यों न हो?

'प्यारÓ को सर्वाधिक मानसिक यातना तब उठानी पड़ती है जब उसमें 'फ्लर्टेशन' अर्थात् झूठा नाटक खेला जाता है। इस झूठे नाटक का शिकार अधिकांशत: नारी को ही होना होता है। नारी जब तक इस झूठे नाटक को समझ पाती है, तब तक वह लुट चुकी होती है। प्यार के झूठे नाटक के द्वारा अपने स्वार्थ की पूर्ति करने की लक्ष्य में केवल युवक ही नहीं होते बल्कि युवतियां भी होती हैं। कुछ पेशेवर युवतियां प्यार को सही रूप में न समझकर अपना उल्लू सीधा करने में लगी रहती हैं।

प्यार में सतर्कता अत्यन्त आवश्यक है। प्यार का स्वस्थ संबंध उस सीमा तक न पहुंच जाए, जिसे तोड़ते हुए भी स्वयं को दर्द ही उठाना पड़े। इसकी सार्थकता तभी सिद्ध हो सकती है जब हम यह समझें कि प्यार एक पूजा है।

जीवन के प्रारंभ से अंत तक रहने वाला 'प्यार' हर इंसान को 'प्रेममय' रहने की शिक्षा देता है। प्यार की इस अनमोल 'बेल' को सींचकर विकसित करने की दिशा में हमेशा प्रयत्नशील रहना चाहिए, साथ ही यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि 'प्रेम बेल' अकारण ही झंझावात की चपेट में आकर धराशायी न हो जाये।

- पूनम दिनकर

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