क्यों डरती हैं महिलाएं रात में

क्यों डरती हैं महिलाएं रात में

नारी का अंधेरे के प्रति खौफ वर्तमान युग की ही देन है, हम ऐसा नहीं कह सकते। वास्तव में देखा जाए तो शताब्दियों से ही औरतें अंधेरे के प्रति भय को अपने अंदर पालती आयी हैं। हां, इतना अवश्य होता है कि युग परिवर्तन के साथ-साथ उसके संदर्भों में फर्क जरूर आता है।

नारी की प्रकृति ही ऐसी होती है कि वह रात के अंधेरे और बरसाती बिजली की तड़कन से एकाएक भयभीत हो उठती है। ये दोनों ही वस्तुएं नारी के कोमल हृदय को सहज ही हतभ्रम कर देती हैं।

ऐसी औरतें जिन्हें सिर्फ चारदीवारी में ही कैद करके नहीं रखा गया है बल्कि दुनियां के सभी सत्यों से रू-ब-रू भी कराया गया है तथा व्यावहारिकता के धरातल पर भी उतारा गया है, जीवन की सच्चाइयों को बताया गया है तथा अपने-आप अनेक अनुभवों को भी जिन्होंने आत्मसात किया है, वैसी औरतों के मन में भी रात का अंधेरा और बिजली की कौंध का डर समाया होता है। नारियों के इन डरों के पीछे अगर मनोवैज्ञानिक तथ्यों की तलाश की जाती है तो यही ज्ञात होता है कि नारी का सहज कोमल हृदय ही इसमें कभी हद तक सहायक होता है। साथ ही साथ हमारा सामाजिक परिवेश, पालन-पोषण की भारतीय परंपरा और प्रकृति की आड़ में स्त्रियों के प्रति पलता 'कमजोर' शब्द जैसी भावना भी उनके डर को बढ़ाने में मददगार हुआ करती हैं।

वर्तमान सामाजिक परिवेश में अगर नजर दौड़ाई जाये तो पाया जाता है कि रात के अंधेरे में ही प्राय: सब अनैतिक कार्यों को जन्म दिया जाता है। आज से पहले भी नारियां रात के अंधेरे में घर से बाहर निकलने में डरा करती थीं लेकिन उनका डर उस समय उस अदृश्य शक्तियों से हुआ करता था जिसके पास उनके विश्वासानुसार उन्हें नुकसान पहुंचाने की अद्भुत शक्ति हुआ करती थी।

वर्तमान समय में प्राय: सब युवतियों के मन में एक आधारहीन डर ने अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया है। आज उन्हें मनुष्य-पुरूष के रूप में हर तरफ घूमता हुआ एक 'नर पिशाच' नजर आता है। एक ऐसा नर पिशाच जो बहन का भाई, माता का पुत्र, पत्नी का पति कहलाता है और जिसके कंधों पर नारियों को सुरक्षा का दायित्व है। जो दिन में राखी बंधवाता है और रात के अंधेरे में उसी सुकोमल शरीर को अपनी बाहों में मसलकर अनखिली कली के पराग रस का पान करना चाहता है।

पता नहीं इस अंधेरे से निकलने में या यूं कहें कि इस अंधेरे पर विजय हासिल करने में नारियों को और कितनी सदी तक इंतजार करना पड़ेगा? वर्तमान समय की नारियों को तो रात के अंधेरे में डर-डरकर जीने की मजबूरी हो गयी है। आज की नारी जब हवाई-जहाज की ऊंची उड़ान को भरने में नहीं डरती तो उसे समाज के भेडिय़ों से भी डरना क्या? मुकाबला आवश्यक है।

- पूनम दिनकर

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