तलाक को नेगेटिव ही न मानें

तलाक को नेगेटिव ही न मानें

कभी-कभी दंपति डाइवोर्स लेकर फिर से नई जिन्दगी की शुरूआत कर सकते हैं। दरअसल तालमेल न बैठने या अन्य विपरीत परिस्थितियों, पति की क्रूरता, ससुरालियों का लालच, पत्नी के बद्दिमाग, घमंडी, कामचोर होने के कारण पति पत्नी का जीवन इतना दुखद हो जाता है कि साथ एक पल गुजारना भी मुश्किल लगता है। बच्चे न हों, तब तक तो डाइवोर्स इतना त्रासद नहीं लेकिन बच्चे होने और उनके समझदार हो जाने के बाद होनेवाला डाइवोर्स बच्चों की साइकी पर गहरा असर डालता है।

दंपति में होने वाली रोज की किच-किच उन्हें तनाव से भर देती है। इसका असर उनकी रोजमर्रा की जिन्दगी पर पड़ता है। क्रोध और चिड़चिड़ापन उनके व्यक्तित्व को कुंठित कर देता है। कभी-कभी समझौता हो जाता है मगर कभी-कभी बात तलाक पर ही खत्म होती है। पति को अहंकार होता है कि मेरे लिए लड़कियों की क्या कमी। पत्नी जरूर फिक्रमंद हो जाती है कि भविष्य का क्या होगा? चारों तरफ से लानत मलामत मेरी ही होगी। मुझमें ही लोग दोष ढूंढेंगे कि मैं निभा नहीं पाई। इसके साथ ही कहीं गहरे में उसे अपराधबोध भी सताने लगता है। स्वयं को अस्वीकृत किए जाने के अपमान का दंश उसे हमेशा चुभता है।

हालांकि आज स्त्री हर तरह से सक्षम हो गई है। वह अकेले रहकर अपनी आजीविका आसानी से चला सकती है। यही नहीं, वह बच्चों को भी अकेले पाल सकती है। यह बात और है कि ऐसे में बहुत सी मुश्किलों का सामना करना

पड़ता है।

आपसी रज़ामंदी से होते तलाक:-

आजकल वक्त सभी के लिए कीमती है। आज की पीढ़ी वर्तमान में जीने में और ऐशपूर्ण सुखमय समय बिताने में विश्वास करती है। ये लोग ज्यादा समझदार हो गए हैं इस संदर्भ में, कम से कम यह जानकर कि कोर्ट के चक्कर में जीवन के न जाने कितने अमूल्य साल गुजर जाते हैं, वे आपसी रजामंदी से तलाक ले लेते हैं। यह फैसला दोनों पार्टियों को सूट करता है।

ऐसा भी होता है कि कड़वाहट से भरे पति पत्नी में से एक, दूसरे को तंग करने और उससे बदला लेने के इरादे से तलाक नहीं देते। सोचते हैं काटने दो इन्हें कोर्ट के चक्कर और होने दो आर्थिक रुप से तंगहाल लेकिन जैसा कि ऊपर कहा गया है, ज्यादातर पति पत्नी समझदारी से ही काम लेते हुए आपसी रजामंदी से तलाक लेे लेते हैं। लड़कियां जो खुद अच्छा कमाती हैं, स्त्री धन, दहेज में दी गई रकम आदि की चिंता नहीं करतीं। इसी तरह लड़के भी तंगदिली न दिखाते हुए पत्नी जो कुछ भी उनसे लेना चाहती है, खुशी से दे देते हैं। निश्चय ही आज की समृद्ध जनरेशन में पैसे को लेकर खुद्दारी बढ़ी भी है।

जब समस्याएं हल न हों:- विवाह को लेकर लड़कियां जो सपने संजोती हैं, उसमें टी.वी. व फिल्मों का उन पर अत्यधिक प्रभाव होता है। हकीकत से सामना होने पर सब सपने टूट कर बिखरने लगते हैं। ईगो का टकराव, आशाओं का पूर्ण न होना, घर में पति के अलावा औरों की उपस्थिति सहन न होना, दहेज के लिए प्रताडि़त होना, सेक्सुअल अंसतोष, पति द्वारा हिंसा, विवाहेत्तर संबंध, मानसिक दूरी, सहनशीलता का अभाव तथा आर्थिक स्वतंत्रता को लेकर गुरूर, पति का शराबी होना तथा दोनों का अपरिपक्व होना ऐसे कारण हैं जिनके कारण पत्नी पति से विरक्त रहने लगती है। असंतोष इस हद तक बढ़ जाता है कि तलाक की नौबत आ जाती है।

अपनी खुशियों को लेकर आज की स्त्री बहुत सजग है। उनके हिसाब से अब सीता सावित्री के दिन लद गए हैं। औरत का अपना अलग वजूद है। अपने ढंग से अपना जीवन गुजारने का उसे भी पूरा हक है। जब शादी करने के बाद वो खुशी और संतोष नहीं प्राप्त होता जिसकी हर औरत को ख्वाहिश होती है, पति पत्नी में निभ नहीं पाती, हमेशा लड़ाई झगड़ा ही होता रहता है तो उन्हें लगता है कि इससे अच्छा है अलग ही रहा जाए। यह फैसला आवेश में लिया जाए तो हो सकता है बाद में पश्चाताप होने लगे। तलाक लेना जीवन का एक अहम फैसला है। बच्चे पर मुश्किलें और भी बढ़ जाती हैं।

अकेली औरत की मुश्किलें भी कम नहीं होती और दूसरी शादी सफल ही हो, इस बात की भी कोई गारंटी नहीं होती। नये सिरे से फिर से एडजस्टमेंट की प्रक्रिया शुरू करना आसान नहीं।

यह सच है कि तलाकशुदा स्त्री को समाज हेय दृष्टि से देखता है। पुरूष अपने ढंग से तलाकशुदा स्त्री के बारे में सोचते हैं। उन्हें वे ईज़ी गेम नजर आती है, खासकर जवान और खूबसूरत होने पर। वे हमेशा उसकी मदद को तैयार रहते हैं। वह आसानी से उनकी सर्विसेज का इस्तेमाल कर सकती है। यह बात और है कि यह सर्विस उन्हें मुफ्त नहीं मिलती। स्त्रियों का रवैय्या उनके प्रति अलग होता है। उन्हें वहां डेंजर नजर आता है। ऐसी स्त्री के प्रति उनकी धारणा अच्छी नहीं होती। 'जरूर यह स्त्री करप्ट होगी, तभी पति ने छोड़ दिया' यह उनका पहला रिएक्शन होता हैं।

कभी किसी केस में ऐसा होता होगा लेकिन ज्यादातर केस में ऐसा नहीं होता कि औरत के चरित्रहीन होने के कारण उसे तलाक दिया गया हो। हां, वह स्वयं तलाक लेना चाहे, वो और बात है।

आज पारस्परिक सहमति से तलाक लेने वालों की संख्या बढ़ रही है। जब जीवन बोझ बन जाए और मेल मिलाप होने की जरा सी भी गुंजाइश न रहे तो यही एक रास्ता बचता है। बावजूद अपनी खामियों और नकारात्मकता के इसके प्लस पॉइंट्स भी हैं जब दोनों ही पक्ष फिर से एक सुखद संतुष्ट विवाहित जीवन जीने लगें क्योंकि मनपसंद साथी के साथ जीवन गुजार पाने से बढ़कर सुख नहीं। यह गलती सुधार पाने का एक सुनहरी अवसर होता है। इस बार दोनों पक्ष सावधान रहते हैं और इस बात को लेकर कांशियस भी कि अगर इस बार भी न निभी तो दोष उन्हीं का माना जायेगा।

- उषा जैन 'शीरीं'

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