सेक्स एज्युकेशन पेरेंट्स की नैतिक जिम्मेदारी

सेक्स एज्युकेशन पेरेंट्स की नैतिक जिम्मेदारी

बच्चों को सही समय पर सेक्स जैसे अह्म विषय पर जानकारी देना ताकि वे गुमराह न हो जाएं, पेरेंट्स की नैतिक जिम्मेदारी है। अपनी जिम्मेदारी निभाने में जब वे कोताही करते हैं तो उसका खमियाजा बच्चों के साथ उन्हें भी भुगतना पड़ता है।

अब वक्त बदल गया है। आज के हाईटैक युग में टीवी और इंटरनेट की बदौलत बच्चों की इनोसेंस खत्म हो चली है। उनकी स्मार्टनेस और इंटेलिजेंस इंप्रैस जरूर करती है लेकिन ज्यादा एक्सपोजर ने उन्हें अपरिपक्व उम्र में ही वो सब कुछ समझा दिया है जो समय पूर्व मिलने के कारण बच्चों को गलत दिशा की ओर मोड़ रहा है।

बच्चों में हर बात को लेकर औत्सुक्य होता है जो कुदरती है। इसमें बुराई भी नहीं क्योंकि इसी से वे सीखते भी हैं लेकिन बात जब सेक्स जैसे वर्जित विषय की हो तो वे खुलकर माता पिता से कुछ पूछ नहीं पाते। ऐसे में अपनी जिज्ञासा मिटाने के लिए वे उधर उधर से गलत सोर्स से जानकारी हासिल करते हैं। कभी दोस्तों के साथ पोर्न साइट्स देखकर कभी चीप किताबें पढ़कर। यह जानकारी उन पर गलत असर डालती हैं, उन्हें गुमराह करती है।

अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए उन पर मंडराते खतरे से उन्हें बचाने के लिए पेरेंट्स को अपनी झिझक छोड़कर उन्हें सेक्स के बायलॉजिकल पहलू तो बताने ही हैं। साथ ही उससे रिलेटेड अन्य पहलुओं को भी विस्तार से समझाना चाहिए।

. किस उम्र में करें बात:- बच्चों को सेक्स की जानकारी उनकी उम्र को देखते हुए ही दी जानी चाहिए। एक चार पांच वर्ष का बच्चा क्यूरियस होकर जब पूछता है मॉम क्या बेबी नर्सिंग होम से बाय करके लाते हैं? तो उसे आप बेबी के जन्म लेने की प्रक्रिया डिटेल में नहीं समझा सकती लेकिन यह जरूर बता सकती हैं कि बेबी मौम के पेट में नौ महीने तक पलता है। फिर दुनिया में डॉक्टर की मदद से जन्म लेता है।

एक टीनएजर बच्चे को मेडिकली सेक्स के बारे में यथार्थ डिसेंट वे में समझाया जा सकता है। इसे केवल फिजीकल एक्ट ही न बताकर इसके इमोशनल साइड पर ज्यादा फोकस किया जाना चाहिए, यह बताकर कि फिजीकल तो जानवर भी होते हैं लेकिन इंसान के लिये लव और इमोशंस यहां ज्यादा मायने रखते हैं। ओवर ऑल परसपेक्टिव ही बात को सही तरीके समझाने के लिये जरूरी है, आधा अधूरा ज्ञान नहीं। तभी बच्चे सेक्स को लेकर कोई गलत धारणा नहीं पालेंगे।

बात करते समय रहें कूल:-

मनोवैज्ञानिक निधि खोसला के अनुसार अक्सर पेरेंट्स सेक्स पर बात करते हुए बहुत ऑकवर्ड फील करते हैं। उनकी शर्म झिझक उनके चेहरे पर साफ झलकती है। इससे बच्चा भी कांशियस होकर नॉर्मल नहीं रह पाऐगा। इसलिए जरूरी है कि इस तरह की बात करते हुए आप कूल रहें। सेल्फ कॉनफिडेंट रहें। बेवजह दुराव छुपाव न करें बल्कि इसे नेचरल बात बताते हुए उसका वैज्ञानिक कारण बताएं। उसे सच्चाई से रू-बरू करायें ताकि वो भ्रम न पाले, राह न भटके।

कैसे करें बात:- पेरेंट्स अपने बच्चों के बहुत क्लोज होते हैं। एक ही छत के नीचे साथ-साथ रहते वे हर समय इंटरएक्ट करते हैं। ऐसे में रोजमर्रा की स्थितियों में किसी भी समय जब अच्छे मूड में बातें हो रही हों या फिर टी वी देखते, गृहकार्य करते या कोई इनडोर गेम खेलते हुए बातों-बातों में ये बातें की जा सकती हैं। इससे बच्चे को ये सब बातें नॉर्मल लगेंगी।

टीनएजर के लिए खास बातें:- ये प्यूबर्टी पीरियड होता है जब बच्चों का शारीरिक विकास तेजी से होने पर शरीर में कई तरह के बदलाव आने लगते हैं। अपोजिट सेक्स के प्रति केमिकल अटैऊक्शन होने लगता है। इस नाजुक पीरियड में बच्चों के बहकने के चांस रहते हैं। जरूरी है कि इस समय टीनएजर बच्चे को उनके सीक्रेट बॉडी पाटर्स के बारे में बायलॉजिकली समझाते हुए उनकी सफाई के बारे में बताया जाए।

दूसरों की बॉडी लैंग्वेज, अच्छे बुरे स्पर्श में फर्क करना उनके लिये समझना जरूरी है। लड़कियों को खासतौर से कामुकता से अपने को बचाना तथा सुरक्षा का ध्यान रखना खतरों को अवॉयड करना आना चाहिए। यह आपके सही मार्गदर्शन से ही संभव हो पाएगा।

आजकल बुक स्टोर्स में सेक्स की जानकारी देने वाली स्टैंडर्ड बुक्स काफी तादाद में मिल जाती हैं जिनकी मदद भीे आप ले सकती हैं। सही जानकारी मिलने पर बच्चे में सेक्स को लेकर एक हेल्दी, सकारात्मक नजरिया विकसित होगा। यह उसके हेल्दी डेवलपमेंट एक सुलझे व्यक्तित्व के लिए बहुत असरदार साबित होगा।

- उषा जैन 'शींरी'

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