महिला सिपाहियों का दांपत्य जीवन

महिला सिपाहियों का दांपत्य जीवन

मीना नाम की पुलिस आरक्षक का विवाह इंदौर के राजेश से हुआ था। राजेश भी पुलिस सेवा बल में आरक्षक है। विवाह के दो माह बाद घर में कलह बढ़ी और मामला अदालत की सीढिय़ों तक पहुंच गया। मीना ने एक दिन अदालत में ही राजेश को पकड़ कर भद्दी गालियां दी।

मामले की तह में जाने पर पता चला कि विवाह की पहली रात ही मीना ने अपने मर्दाने स्वभाव के कारण श्रंगार करने से इंकार कर दिया था व उसी रात राजेश से बात करते समय मर्दानी गालियों का सहज भाव से उपयोग किया।

ऐसी कई महिला पुलिस आरक्षकों से मिलने पर यह पाया कि वे सफल गृहिणी नहीं हो पाती। सत्तर प्रतिशत महिला सिपाही विवाह के एक वर्ष के अंदर विवाह संबंधों को तोडऩे के कगार पर पहुंच जाती हैं। महिला सिपाही सफल गृहिणी क्यों नहीं होती, उनका पारिवारिक जीवन कलहयुक्त क्यों होता है, आज भी महिला सिपाही व सफल गृहिणी परस्पर विरोधी धारणायें क्यों हैं, इस स्थिति की तह में जाने के पहले हमें देखना होगा -

- क्या महिला सिपाही घर गृहस्थी को पूरा समय दे पाती हैं?

- क्या वे बच्चा पैदा करके उन्हें स्वाभाविक मातृत्व देने की स्थिति में रहती हैं? क्या वे वैवाहिक संबंधों के निर्वाह में पति को पूर्ण व एकल रूप से संतुष्टि दे पाती हैं?

- उनके व्यवहार बातचीत के तरीके, रसोई में उनकी भूमिका सामान्य गृहिणी की तरह रहती है क्या?

- क्या वे रिश्तेदारी में पति के मित्रों में, शादी ब्याह में अन्य सामान्य महिलाओं की तरह उत्सव मनाने की स्थिति में रहती है?

- क्या वे पति के प्रति पूर्ण रूप से वफादार रह पाती है?

- इन सवालों के उत्तर व्यावहारिक तौर पर नकारात्मक ही मिलते हैं - इन नकारात्मक भूमिकाओं के कारण महिला सिपाही के प्रति यह सामान्य धारणा हो जाती है कि वे सफल गृहिणी नहीं हो पाती?

एक सामान्य सर्वेक्षण के अनुसार निन्यानवे प्रतिशत पुरूष महिला सिपाहियों से विवाह करने को तैयार नहीं हैं। जो एक प्रतिशत करते हैं, उनके विवाह के साल भर बाद न्यायालय में तलाक के प्रकरण आ जाते हैं। अब कौन दोषी होता है इसमें? पुरूष की शंकालु प्रवृत्ति या महिला आरक्षक का बिंदास आचरण या उनका समय-असमय ड्यूटी रहने के कारण परिवार के लिये पत्नी के रूप में, गृहिणी के रूप में उनका सफल न होना?

यौन कुंठायें इनकी आवश्यक नहीं कि ये महिला पुलिसकर्मी मां-बहिन की भद्दी-भद्दी गालियां बकें लेकिन वे इस अभिव्यक्ति को अपने कर्तव्य का हिस्सा समझ लेती हैं। असर परिवार व बच्चों पर निश्चित ही पड़ता है। सख्त होना अलग बात है और शालीन न होना अलग। इसमें ये महिला पुलिसकर्मी अंतर नहीं कर पाती। यद्यपि अधिकांश महिला सिपाही काफी दृढ़ एवं शालीन रहती हैं तो भी यौन कुंठा एवं यौन विकृति की शिकार भी ये महिला सिपाही रहती हैं।

महिला सिपाहियों को सम्मान देने का प्रयास कौन करेगा? इस दिशा में पहल होने की आवश्यकता है अन्यथा और महिला सिपाहियों की मानसिकता विकृत होती जायेगी।

आमतौर पर महिला सिपाही गृहस्थी और परिवार के प्रति न्याय नहीं कर पाती, इसका दोषी हम किसे ठहराये? उनकी नौकरी में व्याप्त दूषित वातावरण को या स्वयं उनके गृहस्थी व नौकरी में संतुलन न बना पाने की कमजोरी को? जो भी हो, यदि महिला सिपाही शिक्षित व समझदार हैं तो वह नौकरी में व्याप्त तमाम बुराइयों के बाद पति व बच्चों को भी खुश रख सकती हैं व नौकरी में भी दृढ़ रहकर पुलिसिया बुराइयों से स्वयं को बचा सकती हैं।

बहरहाल इस धारणा को महिला सिपाही ही अपनी दृढ़ता, सच्चरित्रता व बुद्धिमानी से झुठला सकती है कि 'महिला सिपाही सफल गृहिणी नहीं होती। लोग कहने लगें कि 'महिला सिपाही अधिक व्यावहारिक व समझदार गृहिणी होती है। ऐसा वातावरण निर्मित किया जाना चाहिये अन्यथा समाज का एक बड़ा वर्ग घर-गृहस्थी के सुख से वंचित रह जायेगा।

- अवध श्रीवास्तव

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