लाइलाज नहीं है उदासी

लाइलाज नहीं है उदासी

आत्मविश्वास में कमी आ जाने से व्यक्ति अपने को नाकारा समझ निराशा के गर्त में डूबता चला जाता है। छोटी छोटी सी बातें उसे उद्वेलित करने लगती हैं। वह जीवन से सहज ही हार मान कर कभी आत्महत्या तक करने की सोच बैठता है।

औरतों में उदासी के लक्षण कई बार उनमें बायलॉजिकल परिवर्तन से संबंधित हो सकते हैं। गर्भधारण, रजोनिवृत्ति, मासिक चक्र से पहले या डिलीवरी के बाद उनमें उदासी के फिट पड़ सकते हैं।

आज की तनावभरी जिन्दगी भी इसकी उत्तरदायी मानी जा सकती है इसके अलावा जेनेटिक कारण तो हैं ही। अगर माता-पिता इस मानसिक रोग से पीडि़त हैं तो बच्चे में इस रोग की आशंका 40 प्रतिशत होती है, किसी एक के पीडि़त होने पर इसकी आधी। हार्मोन का असंतुलन भी उदासी का कारण हो सकता है। रॉयल बुलेटिन की नई एप प्ले स्टोर पर आ गयी है।royal bulletin news लिखे और नई app डाउनलोड करें

ऐसा नहीं है कि यह बीमारी लाइलाज हो। अगर उचित विधिवत सही इलाज मिले तो रोग दूर किया जा सकता है। इलाज के सही तरीके हैं-दवाएं, सलाह, मनोचिकित्सा और इलेक्ट्रिक शॉक।

भूलकर भी ओझाओं या झाड़ फूंक करने वालों के चक्कर में न पड़ें। इससे बीमारी ठीक होने के बजाय और बढ़ेगी। इस तरह के ढोंगी लोग आपकी जेब तो साफ करेंगे ही, कभी कभी मरीज की जान भी चली जाती है।

मन से या किसी से भी पूछकर कोई भी दवा कभी न लें। डिग्री होल्डर अनुभवी डॉक्टर की सलाह पर चलें।

डिप्रेशन के मरीजों के लिए मनोचिकित्सा तथा सलाह (काउंसलिंग) उपयोगी है। मनोचिकित्सा में रोगी के अंतर्मन की थाह ली जाती है। कई बार रोगी में बचपन से पलती आ रही कुछ ग्रंथियां चिकित्सक के सामने खुलती हैं। ऐसा उनकी एक्सपर्ट बातचीत के द्वारा ही संभव हो पाता है। बीमारी की जड़ पकड़ में आने पर आगे का इलाज आसान हो जाता है। केस गंभीर होने तथा मरीज में आत्महत्या की प्रवृत्ति होने पर इलेक्ट्रिक शॉक देकर मरीज का इलाज किया जाता है। रॉयल बुलेटिन की नई एप प्ले स्टोर पर आ गयी है।royal bulletin news लिखे और नई app डाउनलोड करें

मानसिक रोगों को लेकर समाज में कई गलतफहमियां हैं। लोग इसे रोग नहीं समझते। परिणामस्वरूप वे रोगी से सहानुभूति न रख उसका मजाक बनाने से नहीं चूकते। इससे स्थिति और बिगड़ती है।

मानसिक रोग किसी के अपने हाथ की बात तो नहीं। अन्य रोगों की तरह यह रोग ही है। इसके उपचार में रोगी के परिवार का सहयोग आवश्यक है। रोगी को चाहिए परिवार का स्नेह, प्यार, अपनापन और विश्वास। उसे दिल खोलकर बात करने के लिए प्रेरित करें।

अगर आपको लगता है कि रोगी आत्महत्या कर सकता है तो आपकी उसके प्रति जिम्मेदारी अत्यधिक बढ़ जाती है। अगर वह आपका अपना है तो उसे एकाकी न छोड़ें और नींद की गोलियां, छुरी व चाकू जैसे हथियार उसके पास न रहने दें। अगर भावावेश में वह अपना या परिवार का कोई भारी नुकसान करने की सोचे तो उसे धैर्य से समझाएं बगैर उसे यह महसूस कराए कि वह कम अक्ल या नीम पागल हैं।

रोगी स्नेह प्यार मिलने पर जल्दी ठीक हो सकता है। दवाइयां तो अपना असर करती ही हैं।

- उषा जैन 'शीरीं'

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