नजर तेरी बुरी, बुर्का मैं पहनूं

नजर तेरी बुरी, बुर्का मैं पहनूं

यह सही है कि लड़कियों के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों के पीछे केवल उसके रिवीलिंग कपड़े ही कारण नहीं हैं लेकिन निस्संदेह यह एक कारण है और वो भी अहम कारण। हो सकता है उत्तेजित शख्स तत्काल अपनी हवस न मिटा पाने का फ्रस्टे्रेशन लिए फिर मौका मिलते ही उसे पूरी करने का प्रयत्न करे या कर गुजरे।

तर्क दिया जाता है कि ये कपड़े फैशन में हैं और कुछ लड़कियों महिलाओं की बेहद पसंदीदा डे्रसेज हैं। वे उन्हें पब्लिक में क्यों नहीं पहन सकती? संस्कृति के नाम पर संकुचित विचारधारा दर्शाते हुए इन पर इन डेऊसेज को पहनने की पाबंदी लगाना कहीं से भी जायज नहीं है। रॉयल बुलेटिन की नई एप प्ले स्टोर पर आ गयी है।royal bulletin news लिखे और नई app डाउनलोड करें

इस तरह के तर्क ज्यादातर तो ग्लैमर वर्ल्ड से संबंधित लोग ही देते हैं क्योंकि यहां उनके अपने स्वार्थ निहित हैं। किसी को माल बेचना है किसी को खुद पहनने लायक फिगर न रहा तो बहू बेटी को यह सब पहनाकर पैसा कमाना है। यह आजादी नहीं, बर्बादी है।

सोच बदलनी है। लड़का लड़की बराबर हैं तो जिस बात के लिए लड़कों पर पाबंदी नहीं, लड़कियों पर क्यों? अपनी पसंद का लाइफस्टाइल (विवाह पूर्व सैक्स, लिव इन रिलेशनशिप इत्यादि) अपनाने का कुछ वेस्टर्न स्टाइल के फूहड़ कपड़े कुछ उनसे भी दो कदम आगे अपने ढंग से पहनने का हक हमें क्यों न मिले। रॉयल बुलेटिन की नई एप प्ले स्टोर पर आ गयी है।royal bulletin news लिखे और नई app डाउनलोड करें

इस अपसंस्कृति के चलते क्या हम एक अच्छे समाज की कल्पना कर सकते हैं? मानें चाहे, न मानें लेकिन अपराध करने वाला जितना गिल्टी है, उसे जानबूझकर ललचाने, टैंप्ट करने वाला भी निर्दोष नहीं कहलाएगा।

औरतों को मान लेना चाहिए कि वे शारीरिक ताकत में पुरूषों से मुकाबला नहीं कर सकती चाहे वो जूडो कराटे सीखें या खेल के मैदान में झंडे गाड़ें। आत्मविश्वास अपनी जगह ठीक है लेकिन ओवर कॉनफिडेंस कई बार ले डूबता है। ईश्वर ने उसे जो छठी इंद्रिय दी है उस का प्रयोग उसका सबसे बड़ा एसेट है। उसे इस्तेमाल करने की टेऊनिंग बेटियों को मां बचपन से देगी तो ज्यादा से ज्यादा लड़कियां आफत में पडऩे से बच सकती हैं।

समाज में औरतों के प्रति बढ़ते जुर्म के खिलाफ अवेयरनेस जगाना निस्संदेह आज बहुत जरूरी है। नुक्कड़ नाटक कहानियों फिल्मों द्वारा पुरूषों को औरतों के प्रति संवेदनशील बनाने की दिशा में एक अच्छा कदम होगा। जिस तरह अपनी ईमानदारी, सच्चाई और डेडिकेशन से अन्ना हजारे ने बुराई के खिलाफ अलख जगाकर देश के कोने-कोने तक अपनी आवाज पहुंचाकर समर्थन प्राप्त किया, उसी तर्ज पर काश, स्लटवॉक न होकर 'रिसपेक्ट वॉक' परेड की जा रही होती।

- उषा जैन 'शीरी'

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