क्या है विवाह का अर्थ?

क्या है विवाह का अर्थ?

शादी एक ऐसा शब्द है जिसके बारे में सोचते ही हर किशोरी के मन में उमंग और उत्साह से भरी अनेक वृत्तियां उभर आती हैं। हर किशोरी यही सपना देखती है कि उसे एक सुखद ससुराल एवं चाहने वाला हमसफर मिले।

न केवल किशोरियां बल्कि उनके माता पिता का भी यही स्वप्न होता है कि उनकी पुत्रियों को सुखद एवं सुखी परिवार मिले। हर माता-पिता यही चाहते हैं कि उनकी पुत्री का जीवन सदा आनंद से परिपूर्ण हो परन्तु सवाल यह उठता है कि क्या सचमुच विवाह सुखद जीवन की शुरूआत होता है? शायद नहीं। रॉयल बुलेटिन की नई एप प्ले स्टोर पर आ गयी है।royal bulletin news लिखे और नई app डाउनलोड करें

विवाह के बारे में यदि चिंतन करें तो उसमें हमें लाखों करोड़ों लोगों के सपने, आशाएं, उमंगें आदि नजर आएंगे। उसी विवाह की अब केवल इतनी ही परिभाषा रह गई है कि दहेज के नाम पर उत्पीडऩ, पति का रूखापन, हर रोज के झगड़े, सास-ससुर की डांट आदि। आज के समाज में विवाह केवल इन्हीं सब का नाम रह गया है। वैसे कहने को तो यह सब सदियों से नारियों के साथ हो रहा है लेकिन बदलते वक्त में बदलती हुई समस्याएं नये-नये रूप में सामने आती हैं।

23 वर्षीय आशा कितनी उत्साहित थी, अपने विवाह को लेकर लेकिन क्या पता था कि विवाह के दो दिन बाद से ही उसे सास के कटु शब्दों का उसे शिकार होना होगा। नई नवेली आशा के लिए यह और भी दुखद था। उसे इस बात का सामना करना था कि उसका पति रमेश भी अपनी मां की तरफ से बोलता था। यह केवल आशा के साथ ही नहीं होता बल्कि अनेकों ऐसे उदाहरण हैं। रॉयल बुलेटिन की नई एप प्ले स्टोर पर आ गयी है।royal bulletin news लिखे और नई app डाउनलोड करें

० 19 वर्षीय गौरी की कथा तो कुछ और ही है। शादी होने के एक महीने बाद से ही उसके ससुराल वालों ने उससे दहेज की मांगें शुरू कर दी। थोड़े समय तक तो गौरी के घरवालों ने उनकी मांगें पूरी की परन्तु जब उन्होंने इसका विरोध किया तथा ससुरालवालों को पुलिस की धमकी दी तो उन्हें इसकी सजा जली हुई गौरी के रूप में मिली।

यह केवल आशा या गौरी के साथ ही नहीं होता बल्कि हर उस औरत के साथ हो रहा है जो ससुरालवालों के जुल्मों की शिकार है। केवल ससुराल वालों की वजह से ही नहीं बल्कि अपने पतियों के कारण भी अनेक युवतियां परेशान होती हैं।० सवाल यह उठता है कि क्या एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति पर निर्भर हो, यही विवाह है। क्या विवाह के बाद एक औरत का जीवन केवल अपने ससुरालवालों और पति की गुलामी, उनकी इच्छाओं पर निर्भर रहना ही होता है? क्या उसका अपना कोई अस्तित्व नहीं होता।

आज के इस युग में जहां नारियां स्वयं अपने पैरों पर खड़ी होती हैं, अपने बलबूते पर गृहस्थी चलाने की क्षमता रखती है, जब उनके साथ ऐसी घटनाएं हो सकती हैं तो जरा सोचिए फिर आम औरतों का तो अपने ससुराल में कोई अस्तित्व ही नहीं होता होगा। यही प्रश्न आज हर किसी के मन में है और यह प्रश्न ऐसा है जिसका उत्तर शायद ही कभी किसी को मिले।

- सपना जैन

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