एकांगी परिवारों में असुरक्षित हैं महिलाएं

एकांगी परिवारों में असुरक्षित हैं महिलाएं

आज शहरों में सुख सुविधा जुटाने के लिए अपना परिवार छोड़ पति पत्नी अकेले रहने लगते हैं। महसूस यह किया जाता है कि एकांगी परिवार बनाकर रहेंगे तो अधिक सुख-समृद्धि की आधुनिक भौतिक वस्तुओं का संग्रह कर चैन से रह सकेंगे। बच्चों को अच्छा खान-पान व अच्छी शिक्षा आदि दी जा सकेगी।

इन सोचे गये उद्दश्यों की पूर्ति हेतु वे कोई कसर नहीं छोड़ते। आधुनिक जीवन की सभी वस्तुओं को एकत्रित करने के लिए वे दिन रात एक कर देते हैं। अधिकांश परिवारों में पति पत्नी दोनों ही रोजगार से जुड़े रहते हैं।

सारे दिन की मेहनत के बाद जब वे शाम या रात को मिलते हैं तो मात्र थोड़ा वार्तालाप कर निद्रा में लीन हो जाया करते हैं। ऐसे समय में अधिकांश देखा गया है कि पति पत्नी जरा जरा सी बात पर खीझ या झल्ला उठते हैं और एक-दूसरे को उस की जिम्मेदारी से अवगत कराने लगते हैं। ऐसे दोषारोपणों से अक्सर पति पत्नी में मनमुटाव और झगड़ा आदि भी हो जाया करता है।

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संयुक्त परिवारों में महिला वर्ग सुरक्षित था। घर में पिता-माता, दादा-दादी आदि बुजुर्ग लोगों का साथ रहने से युवा पति पत्नी ऐसी हरकतें करने से पहले दस बार सोचा करते थे। यदि कभी ऐसी नौबत आ भी जाती थी तो उसका निराकरण आपस में कर लेते थे। पति कितना भी क्रूर क्यों न होता रहे पर वह अत्याचार करने से पहले एक बार अवश्य घर के बड़े-बूढ़ों का ख्याल रखता था। एक प्रकार का सुरक्षा कवच महिलाओं के पास था।

आज परिस्थिति नाजुक होती जा रही है। पत्नी शहर में अकेली है। असुरक्षा की भावना तो वैसे ही विद्यमान रहा करती है। पति यदि क्रूर किस्म का है, शराबी या जुआरी है तो जीवन और भी नर्क बन जाता है। शराब पीकर पति आता है। मारपीट करता है और गालियां देता है। उसके सारे अत्याचार महिला को सहने पड़ते हैं जिस पर अंकुश लगाने वाला कोई नहीं रहा करता।

परिवार की चिंताएं, बच्चों का भविष्य, उनके शादी ब्याह, समाज में मान सम्मान, यह सब पूर्व में बुजुर्गों के जिम्मे ही रहा करता था। यह सत्य है कि जिम्मेदारी आने से महिला वर्ग में जागृति आई है परन्तु वह असुरक्षित भी होती जा रही है। अब एकांगी परिवारों में पहले के संयुक्त परिवारों के समान न तो धर्म और पूजा पाठ कर ध्यान दिया जाता है और न वहां नैतिकता का पालन किया जाता है।

- राजू गुर्जर

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