तन और मन रहें प्रफुल्लित

तन और मन रहें प्रफुल्लित

आप चाहे किसी भी पेशे से जुड़े हों, उसमें सफल होने के लिए आपका शारीरिक रूप से स्वस्थ रहना निहायत ही जरूरी होता है। तन के साथ ही साथ मन भी प्रफुल्लित रहना चाहिए। मांसपेशियों की ताकत बढऩे के साथ ही उनके बीच बेहतर सामंजस्य और संतुलन भी स्थापित होना जरूरी है। तभी नर्वस सिस्टम सही रहेगा।

फेफड़े और रक्त संचार की व्यवस्था दुरूस्त होने से शरीर में चुस्ती और फुर्ती का विकास होता है। कैलोरी की भी अच्छी-खासी खपत हो जाती है लेकिन यह तब संभव होगा, जब आप नियमित व्यायाम करेंगे। सुबह की सैर करेंगे। रस्सी कूदना भी एक व्यायाम है। कुछ लोग स्वीमिंग को महत्त्व देते हैं तो कुछ बैडमिंटन को और कुछ सिर्फ खाने और सोने में ही जीवन का सच्चा सुख खोजते हैं। सच यह भी है कि जो जरूरत से ज्यादा सोता है, वह खोता है और जो जरूरत के अनुरूप भी नहीं सोते, वे भी खोते हैं।

आज की भागदौड़ की जिन्दगी में अनियमितताएं बढ़ रही हैं। सोने, उठने खाने-पीने का भी कोई निश्चित समय नहीं होता। जब समय मिला खा लिया वाला दौर जो है। जिसे देखो, उसी के सिर पर भूत सवार है अपनी सफलता के शिखर को चूमने का, दुनियां का सबसे बड़ा दौलतमंद इंसान बनने का। इसी उधेड़ बुन में अपनी जिन्दगी तनावग्रस्त बना डाली। यही कारण है कि अन्य रोगों के साथ-साथ दिल के रोग भी बड़ी तेजी से बढ़ रहे हैं।

खून में कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड की मात्र का नपा-तुला बने रहना सेहत के लिए फायदेमंद है। इस पर ध्यान देना जरूरी है। धमनियां चरबी की परतों के जमने से बचेंगी और उनमें खून का दौरा निर्बाध बना रहेगा। कोलेस्ट्रोल की तरह अमीनो एसिड भी धमनियों में चर्बी जमने की क्रिया को तेज कर देता है। होमोसिस्टीन ऐसा ही एक अमीनो एसिड है जो दिल के लिए ठीक नहीं है।

होमोसिस्टीन का हमारे खान-पान से सीधा संबंध है। यदि हमारे आहार में विटामिन बी-6 और विटामिन-12 कम हों तो होमोसिस्टीन बढ़ जाता है। दरअसल ये दोनों ही विटामिन होमोसिस्टीन को मेथोयनिन में बदलने वाली जैव रासायनिक क्रिया के लिए जरूरी हैं। उनकी कमी होने पर यह क्रिया बाधित हो जाती है और खून में होमोसिस्टीन बढऩे लगता है। ऐसी स्थिति में हरी साग-सब्जियों का भरपूर सेवन करें। जहां तक हो सके, तली-भुनी चीजों को खाने से परहेज करें।

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हमारे शरीर में मौजूद लौह तत्व से ही तरह-तरह के जैविक एंजाइम बनते हैं जो पूरे शरीर में ऑक्सीजन का संचार बनाए रखने में काम आते हैं। इनमें सबसे प्रमुख है-हीमोग्लोबिन। लौह तत्व से ही मायोग्लोबिन भी बनता है जो मांसपेशियों का हिस्सा है। लौह तत्व की कमी से पैरों में सूजन आ जाती है।

व्यक्ति शारीरिक रूप से कमजोर होता चला जाता है। हर पल थकान रहती है, आलस्य बना रहता है, दिल धड़कने लगता है। ज्यादा काम करने पर सांस फूलने लगती है। सिर में दर्द होने लगता है। बेचैनी सताने लगती है। भूख भी नहीं लगती। नींद गायब हो जाती हैं, परिणामत: व्यक्ति अनीमिया का मरीज बन जाता है। इलाज न करने पर दिल भी प्रभावित हो सकता है।

लौह तत्व की कमी को उचित आहार-विहार से ही दूर दिया जा सकता है। दरअसल हमारा खान-पान हमारे शरीर की आवश्कतानुसार होना चाहिए। जिन तत्वों की शरीर को जरूरत है, भले ही वे भोजन हमें नापसंद क्यों न हों, उनका सेवन जरूरी है। हमें अपनी आदत बदलनी होगी। जानबूझकर लापरवाही बरतना अपने स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ ही कहा जाएगा।

अधिक जल्दबाजी तनाव की जननी है। समयानुसार कार्यों को निपटाने की जगह अपने ढंग से कार्यों को करने का आधुनिक अंदाज ही गलत है। असंतुलन बढ़ रहा है। लोग घरों में जागते हैं और दफ्तरों में ऊंघते हैं। जीवन को शांति से जीने की बजाए हम फास्ट जीना चाहते हैं। फास्ट फूड संस्कृति ने हमारी मानसिकता तक को दूषित कर रखा है।

अनावश्यक जिम्मेदारियों को बढ़ाने के साथ-साथ ही हमने अपनी महत्त्वाकांक्षा भी बढ़ा ली है किंतु उनकी पूर्ति के लिए निर्धारित समयावधि को घटा लिया और स्वयं ही तनावग्रस्त जिन्दगी जीने को बाध्य हो गए।

तनावमुक्त रहने के लिए ध्यान योग व प्राणायाम जरूरी हैं जिनके लिए हमारे पास समय नहीं है। यही वजह है कि हमारे लिए समय भी सिकुड़ता जा रहा है। नियमित समय पर संतुलित आहार लेना तभी संभव होगा जब हम अपनी अनावश्यक आवश्यकताओं पर काबू पाने हेतु प्रयत्नशील होंगे। इसके साथ-साथ हमें समय-समय पर हेल्थ चेकअप भी कराना होगा। तभी हृदय रोग से बचाव होगा।

-राजेन्द्र मिश्र राज

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