मौन: वार्तालाप की एक अनमोल कला

मौन: वार्तालाप की एक अनमोल कला

सदियों से मानव पर हो रहे शोधों की अनवरत प्रक्रिया में यह पाया जाता रहा है कि 'मौनम् स्वीकार लक्षणम् एवं मौनम् अस्वीकार लक्षणम'। मौन इन दोनों विरोधाभासी परिस्थितियों का परिचायक होता है।

बहुधा ऐसी परिस्थिति बन जाती है कि हम मुखर होकर समर्थन करना चाहते हैं किन्तु शर्म, संकोच या मितभाषी होने के कारण मौन रह जाते हैं । इस मौन के इर्द - गिर्द हमारी आँखों में एक अजीब चमक और चेहरे पर लाली स्वयंमेव आकर कब्जा जमा लेती है जो सामने वाले को यह जता देती है कि यह मौन सहमति का द्योतक है जैसे किशोर आयु वर्ग के लोग स्वयं की शादी जैसी बातों पर लज्जावश मुखर नहीं होते बल्कि मौन सहमति दे देते हैं।

इसके विपरीत ऐसी स्थिति भी आसन्न हो जाती है जब हम द्वितीय पक्ष से सहमत नहीं होते किन्तु भय, मोह, लोभ या ऐसे ही किसी अन्य कारण से मजबूर होकर मुखर असहमति नहीं जता पाते बल्कि मौन रह जाते हैं। इस मौनता में असहमति के भाव तनाव, खिन्नता या बेचारगी के रूप में देखे जा सकते हैं। प्राय: सामाजिक रूप से बड़ों के सामने या नौकरी करते हुए वरिष्ठ के सामने ऐसा ही होता है।

इसके अतिरिक्त एक आजन्म या व्याधि मूकता होती है जो वार्तालाप में मौन के रूप में देखी जा सकती है। इस मौन में हमारी लाचारी आन्तरिक होती है जिसमें बाह्य परिस्थिति की कोई भूमिका नहीं होती। चाह कर भी इस मौन को तोड़ा नहीं जा सकता।

उपरोक्त प्रथम दोनों परिस्थितियों में मौन होना एक कौशल के रूप में है और सब मिलाकर फायदेमंद भी । कभी - कभी ऐसी स्थिति भी आ सकती है जब मौन होना परोक्षत: अन्याय का समर्थक बन जाता है। यदि आपके समक्ष वार्तालाप में सम्मिलित व्यक्ति या व्यक्ति समूह आपके मौन का सही आशय न समझ पाये तो परिणाम भयावह हो सकता है। जैसे मौन स्वीकृति को ठीक से समझे बिना अस्वीकृति के रूप में ले लिया जाए तो बना बनाया काम हमारे प्रतिकूल जा सकता है और इसके विपरीत असहमति वाले मौन को सहमति मान लिया जाए तो पछतावे के अलावा कुछ भी हाथ नहीं लगता। कुरु दरबार में द्रौपदी चीर हरण के दुखद समय में पितामह, द्रोण आदि का मौन महाभारत का प्रबल कारण बना जबकि उस समय का मुखर विरोध परिस्थिति को बदल सकता था।

सब मिलाकर यह कहा जा सकता है कि वार्तालाप में मौन रहकर भागीदारी निभाना बड़ी कुशलता है किन्तु सचेत रहते हुए। जब लगे कि सामने वाला गलत निष्कर्ष निकाल सकता है जिसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है तो यही मौन आत्मघाती हो सकता है। इसलिए 'मौन' अस्त्र का प्रयोग सोच समझकर करें वरना दुधारी होने से रोका नहीं जा सकता।

-अवधेश कुमार 'अवध'

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