अच्छी नहीं पति की उपेक्षा

अच्छी नहीं पति की उपेक्षा

मरियम की बर्थ-पार्टी में जब जूही काफी देर तक भी न पहुंची तो मैंने फोन करके कारण जानना चाहा। उधर से फोन जूही के पति राजेश ने उठाया। 'हैलो, मैं राजेश बोल रहा हूं।', मैं गीता बोल रही हूं। क्या जीजा जी। आप लोग अभी तक वहीं बैठे हुए हैं। आना नहीं है क्या?

'क्या बताऊं गीता जी, यह जो आपकी सहेली है न जूही, हर वक्त मुन्ने से ही चिपकी रहती है। मुन्ने ने जरा रोना क्या शुरू कर दिया, कहने लगी-उससे नहीं जाया जाएगा। मैं खुद अकेला ही चला जाऊं। अब आप ही बताएं, मैं क्या करूं? पार्टी में अकेला आता क्या मैं अच्छा लगूंगा। और 'सारी' कहकर उन्होंने फोन रख दिया।

यह सुनकर मैं सोच में पड़ गई कि क्या बच्चे हो जाने के बाद मां का दायित्व सिर्फ बच्चा संभालना ही रह जाता है। पति के प्रति उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती। वह पति के साथ बाहर आना-जाना क्यों नहीं चाहती? क्या पति के साथ घूमने-फिरने का उसे मन नहीं करता? क्या इस तरह करके वह पति की उपेक्षा नहीं कर रही?

कुछ अपवादों को छोड़ दें तो अक्सर मां बच्चे के जन्म के बाद हर दम उससे चिपकी रहती है। यहां तक कि न समय पर खाती है और न ही सोती है। ढंग के कपड़े पहनने की भी उसे फुरसत नहीं मिलती। हर वक्त अस्त-व्यस्त रहती है। पति के खाने-पीने, उठने-बैठने, सोने-जागने की भी चिंता नहीं रहती। पति के साथ बाहर आना-जाना तथा प्यार के मीठे बोल बोलना तो जैसे भूल ही जाती हैं। कभी मुन्ने के रोने का बहाना या कभी उसके गीले हो जाने की परेशानी।

आजकल एकल परिवारों की परम्परा बढऩे से बच्चों को संभालना अकेली गृहिणी के लिए काफी मुश्किल हो गया है। बच्चे पालने के चक्कर में न तो वह अपना ध्यान रख पाती है और न ही पति की ओर ध्यान दे पाती है। पहले पति की हर छोटी-बड़ी जरूरत को पूरा करती थी। अब बच्चा हो जाने के बाद बस सारा दिन उसी के काम में व्यस्त रहने लगती है।

इससे पति अपने को उपेक्षित महसूस करने लगता है। वह सोचने लगता है कि ऑफिस से सीधे घर पहुंचने से फायदा ही क्या है। पत्नी के पास उसके लिए समय ही कहां है। वहां न ढंग से चाय-नाश्ता मिलेगा और न ही पत्नी का सानिध्य। वह अपना अधिकांश समय बाहर ही व्यतीत करने लगता है तथा घर के प्रति लापरवाह हो जाता है।

बच्चे के जन्म के बाद अक्सर महिलाएं लापरवाह हो जाती हैं। वे अपने पहनावे तथा बनाव श्रृंगार पर ध्यान देना बंद कर देती हैं। न वे ढंग के कपड़े पहनती हैं और न ही पति के आने से पहले ढंग से तैयार होती हैं। यह स्थिति घातक है। इससे पति खुद को उपेक्षित महसूस करने लगते हैं तथा पत्नी के प्रति उनका आकर्षण भी धीरे-धीरे कम हो जाता है, इसलिए महिलाओं को हमेशा बच्चे से चिपके नहीं रहना चाहिए। बच्चे की देखभाल में इतनी व्यस्त न हो जाएं कि पति का ध्यान ही न रहे। आखिर बच्चा पहले है या पति? पति से ही तो बच्चा है तो पति के प्रति इतनी लापरवाही क्यों?

यह सच है कि मां बनने के बाद आपका दायित्व दो भागों में बंट जाता है। जिसकी वजह से बच्चे को संभालना आपका पहला दायित्व बन जाता है। आखिर आपने मां जैसे गरिमामय पद को संभाला है लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि आप पति की उपेक्षा करनी शुरू कर दें। उनके साथ आना-जाना, घूमना-फिरना बंद कर दें। उनके पास पल-दो-पल के लिए बैठकर बात करना बंद कर दें और हर वक्त अस्त-व्यस्त रहें।

बच्चा जब सोया हो तो घर का काम-काज तथा खाने-पीने की व्यवस्था कर लें। पति के आने से पहले बच्चे को तैयार कर दें और पति के आने पर बच्चा उनको दे दें और खुद चाय-नाश्ते का प्रबंध करने लग जाएं। इससे पति को भी अच्छा लगेगा और वे बच्चे में रूचि लेंगे। पति का घर से और आपसे तथा बच्चे से लगाव बढ़ेगा।

बनाव श्रृंगार करने का यह मतलब कदापि नहीं कि घंटों शीशे के सामने बैठी रहें बल्कि कायदे से कपड़े पहनें तथा व्यवस्थित बाल आपके व्यक्तित्व में चाल चार लगा देंगे। फिर देर किस बात की है। आज, बल्कि अभी से इन बातों पर ध्यान देना शुरू कर दें और अपने पति की उपेक्षा कभी न करें। बच्चे का जन्म पति-पत्नी के आपसी प्रेम को बढ़ाता है, इसे हमेशा याद रखें। पति और बच्चे के प्रति अपने दायित्व में सामंजस्य बिठा कर ही आप अपने पारिवारिक और वैवाहिक जीवन में रंग भर सकती हैं।

- मुसर्रत परवीन

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