बेटी को दें सुसंस्कारों का दहेज

बेटी को दें सुसंस्कारों का दहेज

बच्चों के जवान होते ही माता-पिता को उनकी शादी-विवाह की चिंताएं घेरने लगती हैं। बेटा हो या बेटी, हर माता-पिता की इच्छा होती है कि विवाहोपरान्त उनके बच्चे खुश रहें और जीवन साथी अच्छा मिले जिससे उनका आगे बढऩे वाला परिवार आदर्श परिवार बन सके।

बेटों के विवाह होने पर तो बहू आपके घर आती है। उसे अपने परिवार के नियम आप समझा सकते हैं और घर के आदर्शों को आगे बढ़ा सकते हैं। बेटियां पराया धन होने के कारण दूसरे परिवार में जाती हैं। यदि उनमें अच्छे संस्कार पहले से होंगे तो उन्हें कभी ससुराल वालों या पति से तिरस्कृत होने का अवसर ही नहीं आयेगा।

बेटी को दहेज तो आप अपनी हैसियत से अधिक देते ही हैं, सुसंस्कार लेकर यदि आपकी बेटी दूसरे घर जाती है तो हमेशा उसको प्रशंसा ही सुनने को मिलेगी और आप भी निश्चिंत रह सकते हैं बेटी की शादी के बाद।

आप चाहते हैं कि आपकी बेटी भविष्य में सुखमय व शान्तिपूर्ण जीवन व्यतीत करे तो उसे भौतिक सुख सुविधाओं के साथ दहेज में अच्छे संस्कार भी दें जिससे वह अपने ससुराल में सम्मान व इज्जत पा सके। बेटी के लिए सबसे अमूल्य उपहार उसके संस्कार ही हैं जिससे उम्र भर वह खुशियों के साए तले सुखमय जीवन व्यतीत कर सके।

यह संस्कार कोई पढ़ाई नहीं है जो रट्टा लगा कर इस परीक्षा को पास कर सकें। ये संस्कार तो वह घरेलू वातावरण में रहते हुए हर दिन-प्रतिदिन में सीख सकती है। इस प्रकार व्यवहारिक सीख दें अपनी लाडली को।

- ससुराल का डर मन में कभी भी लेकर न जायें। ससुराल के लोग अपने माता-पिता, भाई-बहन की तरह ही होते हैं। बेटी को कभी ससुराल के नाम पर डरा कर न रखें।

- बेटी को बतायें कि जैसे मायके में अपने माता-पिता को सम्मान देती है और उनकी बातों का पालन करती है, उसी प्रकार उन माता पिता को भी पूरा सम्मान दें और उनकी बातें, रिवाज़ आदि पर उन्हीं के अनुसार चलें।

- सभी रिश्तेदारों के साथ परिवार के सभी सदस्यों के साथ मधुर और नीची आवाज़ में बात करनी चाहिए।

- परिवार में अन्य परिवार वालों के बारे में कभी निन्दा न करें।

- बेटी दो परिवारों को पुल की तरह जोडऩे का काम करती है। कोई ऐसा काम न करें जिससे दोनों परिवारों के बीच कोई दरार पैदा हो या किसी भी परिवार की मान मर्यादा को ठेस पहुंचे।

- बेटी को यह समझा कर भेजें कि अपने साथ लाई भौतिक वस्तुओं का परिवार के साथ मिलकर आनन्द लें। उन पर कभी इठलाएं नहीं, न ही कभी अपने रूप और सौदंर्य पर अभिमान करें।

- मायके के रीति रिवाजों को ससुराल पर मत थोपें। ससुराल के रीति रिवाजों को खुशी से अपना कर उन्हें निभाएं।

- पति की शासक न बन कर उसकी अर्धांगिनी बनें। पति को हर दु:ख सुख में पूरा सहयोग दें। पति की सच्ची तथा ईमानदार साथी बन कर रहें।

- बड़े जेठ जेठानी, ननद आपके बड़े बहन भाई की तरह हैं। उनसे ईर्ष्या न करें। अपना व्यवहार उनसे मधुर बना कर रखें। सुख दु:ख में उनके साथ सहयोग कर के चलें।

- बेटी को समझाएं कि अपने व्यवहार और अच्छे आचरण से सभी का मन जीतने का प्रयास करें।

- बेटी को बताएं कि किसी काम में गलती होने पर यदि कोई बड़ा उसे समझाता है तो क्रोधित न होकर अपनी गलती को सुधारने का प्रयास करे।

- ससुराल के बाकी रिश्तेदारों और पड़ोसियों से संबंध सीमित रखें पर जब भी उनसे मिलें, प्रसन्नचित होकर मिलें। किसी की निन्दा स्तुति न करें।

- घर के प्रत्येक सदस्य का ध्यान रखना आदर्श बहू की निशानी है। इस बात पर ध्यान दें।

- पति या परिवार की निन्दा किसी के बीच में न करें। यदि उनकी कुछ आदतें अच्छी न लगती हों तो प्यार से उनके साथ बात करके गलतफहमियों को दूर करें। छोटी छोटी बात पर बुरा मान कर घर छोड़कर न भागें।

कुछ इस प्रकार के संस्कार उसे माता पिता दें तो अवश्य ही बेटी अपना संसार खुशियों से भर सकती है और अपनी इज्जत के साथ अपने परिवार को भी मान सम्मान दिला सकती है।

- नीतू गुप्ता

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