नारी सशक्तिकरण का ढोंग

नारी सशक्तिकरण का ढोंग

हमारे देश में नारी सशक्तिकरण का हास्यास्पद पहलू यह है कि जहां हम नारी के समान अधिकारों की बात करते हैं वहीं बुर्का, हिजाब, निकाह, मौखिक तलाक जैसी कट्टरपंथी प्रथाओं के सबसे बड़े समर्थक हैं। जब मुस्लिम महिलाओं के समान अधिकार की बात आती है तो वे सभी कट्टरपंथियों के साथ हो जाते हैं।

इसके बाद गांव की गरीब महिला की तो दूर, दिल्ली की पढ़ी लिखी लड़कियों की भी कोई सुनने वाला नहीं। समानता के नाम पर रात की शिफ्ट में काम करने का अधिकार तो महिलाओं को दे दिया गया परंतु उनकी सुरक्षा, आवास व परिवार की कोई सुध लेने वाला नहीं है।

महिलाओं की सामाजिक स्थिति आज भी बहुत खराब है जबकि देश के संविधान में उन्हें बराबरी का अधिकार दे दिया गया है परंतु जमीनी स्थिति यह है कि मुस्लिमों की देखा-देखी अब सभी धर्म, जातियों एवं क्षेत्रों के विशेष पर्सनल ला बन गये हैं तथा इन पर्सनल ला की आड़ में महिलाओं पर अत्याचार किये जाते हैं। अंतर सिर्फ इतना है कि मुस्लिम पर्सनल ला संविधान में वर्णित है जबकि अन्य जातियों एवं क्षेत्रों के पर्सनल ला डंडे के रूप में चल रहे हैं।

यह बड़े दुख की बात है कि इस देश में आज तक महिलाओं की बेहतरी के लिए किसी ने कुछ भी नहीं किया। इस देश का इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा कि महिलाओं की मदद के लिए बने दहेज विरोधी कानून के अंतर्गत आज लाखों, सास, ननद, जेठानियां तथा उनके पुरुषजन वर्षों से जेलों में सड़ रहे हैं। यहां भी उत्पीडऩ नारी का ही हो रहा है मानो नारी तो बनी ही उत्पीडऩ का जहर पीने के लिए हो।

अगर नेता व सरकारें महिलाओं के अधिकारों के लिए कार्य करना चाहती हैं तो पहले उनकी शिक्षा का उचित प्रबंध करें। सरकारें युद्ध स्तर पर सिर्फ लड़कियों के लिए स्कूल, कालेज एवं व्यवसायिक शिक्षण संस्थाओं को खोलें। जब एक बार कोई शिक्षित हो जायेगा तो बाकी अधिकार वह स्वयं ही प्राप्त कर लेता है।

इसके साथ ही साथ यह भी आवश्यक है कि शिक्षा एवं कानून के द्वारा पुरुषों एवं समाज के दृष्टिकोण में बदलाव लाया जाये। हमारे यहां सिर्फ एक दिन ही क्यों, सभी 365 दिन महिला सशक्तिकरण के रूप में मनाये जाने चाहिए क्योंकि यहां पर जहां महिलाओं का सशक्तिकरण आवश्यक है, वहीं पुरुषों को उनके संकीर्ण युग से भी बाहर आना चाहिए। भारत का पढ़ा लिखा युवक भी लड़की को देखते ही अपना आपा खो देता है।

मुम्बई में अनेक बीयर एवं शराब के बार ऐसे हैं जहां पर शत-प्रतिशत महिलाएं वेटर हैं एवं शराब परोसती हैं। इससे क्या महिलाओं का सशक्तिकरण हुआ? नहीं। इसी तरह आरक्षण भी महिलाओं का सशक्तिकरण नहीं कर सकता। सिर्फ शिक्षा एवं पुरुषों के दृष्टिकोण में बदलाव से ही असली सशक्तिकरण होगा।

- डा. कल्पना शर्मा

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