हमारे परिधान ही हमारी पहचान हैं

हमारे परिधान ही हमारी पहचान हैं

बदलते समय, बदलते परिवेश में आधुनिक पहनावे के प्रभाव से कोई भी अछूता नहीं है। सभी वस्त्रों की चकाचौंध की ओर आकर्षित हो रहे हैं। वस्त्रों और उनके डिजाइन से स्त्री-पुरूष, बच्चों, सभी को एक वस्तु के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। लोगों में आधुनिकता की इस अंधी दौड़ में आधुनिक दिखने की लिप्सा बढ़ती जा रही है। आधुनिक डे्रसों का पहनना सोसायटी का प्रतीक बनता जा रहा है।

सिनेमा, टी. वी., इंटरनेट, माडलिंग आदि के माध्यम से नित नये फैशनेबल कपड़े दिखाये जा रहे हैं। आज आधे-अधूरे वस्त्र पहनने में संकोच का अनुभव नहीं हो रहा है। फूहड़ अश्लील वस्त्रों में नारी की अस्मिता खतरे में पड़ती जा रही है। बढ़ते हुए बलात्कार और छेड़छाड़ की घटनाओं के आंकड़े हमसे ही सवाल करते नजर आ रहे हैं कि नारी आज सुरक्षित नहीं है तो क्यों? क्यों आज हमारे पहनावे का अमर्यादित रूप हमारे नैतिक मानदंडों पर उलझ सा गया है?

रूचि के अनुसार वस्त्र पहनना सबका अधिकार है। समय के अनुसार वेशभूषा भी बदलती रहती है। आज की पीढ़ी पहनावे के प्रति अत्यंत सजग है। व्यक्तित्व के निर्धारण में पहनावे के महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता। कद-काठी, रूप रंग और व्यवसाय के हिसाब से ही वस्त्रों का चयन करना चाहिए। यदि आप ऐसी जगह जा रहे हैं जहां आधुनिक डे्रस पर्सनेलिटी का हिस्सा है तो पहनना उचित है परन्तु यदि वहीं आधुनिक डे्रस कोई विद्यार्थी स्कूल में पहनकर आ जाये तो अजीब ही लगेगा।

वस्त्र वस्त्रों के हिसाब से ही पहनने चाहिए, शोपीस की तरह नहीं। आज इस फैशनेबल प्रवृत्ति के दोषी माता-पिता भी हैं। बचपन से ही बच्चों को एक से बढ़कर एक आधुनिक टिपटॉप डे्रस पहनाई जाती है ताकि उनका बच्चा सबसे अलग दिखे, सोसायटी में उनका रौब दिखे कि ऐसी डेऊस और किसी के पास नहीं। ऐसे माहौल में पले हुए बच्चों में नित नए फैशन के कपड़े अपनाने की होड़ रहे तो क्या गलत है? बच्चों को बचपन से सलीकेदार, शालीनता से परिपूर्ण वस्त्र ही पहनाने चाहियें ताकि वे फैशन की होड़ में ऊल जुलूल वस्त्र ही न पहनने लग जायें।

आज सामान्य वर्ग में भी खत्म न होने वाले एक फैशन की होड़ शुरू हो गई है। फैशन के नाम पर बाजार में जो भी परोसा जा रहा है, युवा पीढ़ी हाथों हाथ उसे ले रही है। ग्राहक स्वयं निर्णय नहीं कर पा रहा है कि उसे क्या खरीदना है, क्या नहीं। फैशन के नाम पर कुछ भी पहनना दिमागी दिवालियेपन का ही प्रतीक है, और कुछ नहीं। आज अलमारियां कपड़ों से भरी पड़ी हैं। महीनों एक-एक कपड़े का नंबर नहीं आता। कपड़ों के प्रति मोह रूपी मानसिक विकृति को दूर करें। संयमित जीवन शैली में डे्रसों को रखने की एक निश्चित सीमा रेखा तय करें।

मौके की नजाकत को देखते हुए वस्त्रों का चयन करें। स्कूल, कॉलेजों में आधुनिकता से परिपूर्ण वस्त्रों का कम-से-कम उपयोग करें। शादी-ब्याह, जन्मदिन पार्टी में तो फिर भी आधुनिक पोशाकें चल सकती हैं लेकिन फिर भी वस्त्रों की तड़क-भड़क व रंगों के समायोजन से परिपूर्ण वस्त्र ही पहनें। शोक के अवसर पर अत्यंत हल्के व शालीन वस्त्र ही पहनें ताकि जिनके यहां आप जायें, उन्हें असहजता महसूस न हो।

ध्यान रखें वस्त्र आपके व्यक्तित्व के परिचायक हैं। रंगों व डिजाइन के चयन के साथ-साथ बदलते समय के अनुसार वस्त्रों को पहनना ही विद्वता का द्योतक है जो आपके व्यक्तित्व को और अधिक निखारता है।

- मीना जैन छाबड़ा

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