बच्चे को डरपोक न बनाएं

बच्चे को डरपोक न बनाएं

डर चाहे किसी भी तरह का हो, बच्चों को कमजोर और कायर बनाता हैं। ऐसे बच्चे हर समय खुद को असुरक्षित पाते हैं, और डरे सहमे रहते हैं। उनका उत्साह गर्म पडऩे की बजाय ठंडा पड़ जाता हैं और वे मानसिक रोग के शिकार हो जाते हैं।

इस प्रकार डर बच्चों का भविष्य ही अंधकारमय बना देता है, बच्चों को जरूरत से ज्यादा सुरक्षा प्रदान करना उनको डरपोक बनाता है और अगर उन्हें वह सुरक्षा न मिले तो वे खुद ब खुद अपने आपको पंगु समझने लगते हैं। उनका आत्मविश्वास कभी जागृत नहीं हो पाता।

हाल ही में 7 से 15 साल की आयु वाले लगभग 15 हजार बच्चों पर किए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक लगभग 70 प्रतिशत बच्चे अत्यधिक प्यार व हर जिद पूरी होने के कारण भावनात्मक रूप से कमजोर, हठी और 28 प्रतिशत डरपोक पाए गए। केवल 2 प्रतिशत बच्चे ही आत्मनिर्भर व भावनात्मक रूप से मजबूत थे।

बच्चे डरपोक न बनें, इसके लिए जरूरी है कि उनकी हर ख्वाहिश को पूरा न किया जाए, उनके सामने झगड़ा, करने से बचा जाए, वीडियो गेम और कम्प्यूटर पर काम करने की अवधि निर्धारित की जाए इत्यादि। साथ ही सबसे जरूरी है कि उन्हें बचपन से ही अकेले सोने दिया जाए। अकेले सोने देना उनके लिए सबसे बड़ा सबक होता है। इससे बच्चे आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी बनते हैं।

बच्चे के मन से डर निकालने का जिम्मा उनके माता पिता का है। उन्हें आग, पानी या ऊंचाई से न डराएं। भूत प्रेत, डायन राक्षस आदि से उन्हें डराने की बजाय उन्हें यह बताएं कि यह सब गप्प के अलावा और कुछ नहीं, जब तक आप उनकी हिम्मत नहीं बढ़ायेंगी, उनका डर खत्म नहीं होगा।

यदि कोई बच्चा पटाखे की आवाज से डरता है, तो पहले आप उसके साथ कम आवाज वाले पटाखे छोडें तथा उससे छुड़वाएं। धीरे-धीरे वह तेज आवाज वाले पटाखों से डरना बंद कर देगा।

बच्चों को उचित संरक्षण तो दें पर उन्हें अपना काम खुद करने दें। यदि जरूरी समझें तो किसी बाल मनोचिकित्सक से भी परामर्श ले सकते हैं। यह बच्चों के भविष्य का सवाल है।

- मनीष गर्ग

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