घर परिवार: अभिभावक ही दे सकते हैं बच्चे को उचित मार्गदर्शन

घर परिवार: अभिभावक ही दे सकते हैं बच्चे को उचित मार्गदर्शन

आज अधिकतर माता-पिता अपने बच्चों के व्यवहार से परेशान हैं। अनुशासन का तो बच्चों में पूर्ण रूप से अभाव नजर आ रहा है। अभिभावक उनमें अनुशासन तो उत्पन्न नहीं कर पा रहे पर बच्चे अपने अभिभावकों से अपनी आज्ञा का पालन अवश्य करवा रहे हैं। अभिभावक यही मानकर चल रहे हैं कि आज के बच्चे हैं ही ऐसे और इनको सुधारना टेढ़ी खीर है, इसलिए वे प्रयत्न ही नहीं करना चाहते कि बच्चों में अच्छे गुणों को पनपने का अवसर मिले।

बच्चों में अनुशासन लाने का अर्थ यह नहीं कि आप उन्हें डांट डपटकर रखें, उन्हें मारें-पीटें। अनुशासन पैदा करने के लिए बच्चे के विकास के दौर में उस पर आप अच्छी तरह ध्यान दें। यही वह दौर होता है जब बच्चों में अपनी अच्छी आदतें व बुरी आदतें विकसित होती हैं।

इस विकास प्रक्रिया में बच्चे के अंदर ऐसी भावनाएं विकसित करें जिससे वह आपको दिल से आदर दे। उसका व्यवहार, आदतें ऐसी हों कि आप उस पर नाज़ करें और वह बड़ा होकर एक अच्छा इंसान बन सके। आइए इन कुछ जरूरी बातों पर गौर करें:-

- हमेशा अपने बच्चे की बुराइयों का बखान न करते रहें। उसे यह अहसास कराएं कि वह अच्छा बच्चा है। जब बच्चा अपने लिए अच्छा महसूस करता है तो उसमें आत्मविश्वास जाग्रत होता है और अच्छा बनने के लिए प्रेरित होता है। कई बार अभिभावक दूसरे बच्चों के सामने अपने बच्चे की तुलना उनसे करते हैं जिनसे उनमें हीन भावना का संचार होता है। वे शर्मसार महसूस करते हैं और बजाय सुधरने के वे विद्रोह पर उतर आते हैं।

- अगर आप चाहते हैं कि आपके बच्चे आपको सम्मान दें तो उनसे भी सम्मान से पेश आएं। वैसे भी बच्चा वही सीखता है जो आप उसे सिखाते हैं। अगर आप उससे तू-तू करके बात करते हैं तो वह भी आपसे उसी लहज़े में बात करेगा। बच्चे आपसे इज्जत से बात करें, इसके लिए आप भी उन्हें इज्जत से बुलाएं।

- अपने बच्चे की भावनाओं को महत्त्व दीजिए और आपकी जिंदगी में उसकी क्या अहमियत है, इसका उसे अहसास कराएं। इससे उसे रिलेशनशिप का महत्त्व समझ आता रहेगा, साथ ही आपके और उसके संबंधों में प्यार बढ़ेगा व वह प्यार लेना व प्यार देना दोनों सीखेगा।

- बच्चे को सफलता व असफलता दोनों का सामना करना सिखाइए। अगर उसे किसी कार्य में असफलता मिलती है तो उसके साथ बुरी तरह पेश मत आइए। उसे उसकी असफलता के कारण का अहसास कराइए ताकि वह उस गलती को पुन: न दोहराए। कई बच्चे सफलता प्राप्त करते-करते असफलता आने पर घबरा कर गलत कदम भी उठा लेते हैं।

- यह सत्य है कि बच्चे को कुछ सिखाने के लिए स्वयं बच्चा बनना पड़ता है। आप भी जो कुछ अपने बच्चे को सिखाने जा रहे हैं, खुद सीखिए। उनकी आंखों से देखिए, उनकी जरूरतों को महसूस करिए। तभी आप उन्हें अच्छी तरह समझ पाएंगे।

- बच्चे के लालन-पालन में सबसे ज्यादा जरूरी है सहन शक्ति। कई माता-पिता बच्चे की हरकतें देख कर उसे मारना पीटना शुरू कर देते हैं। मारना किसी चीज का इलाज नहीं है। इसलिए स्वयं पर नियंत्रण रखिए और बच्चे को यथा संभव प्यार से ही समझाने की कोशिश करिए।

- आजकल माता-पिता सबसे ज्यादा परेशान हैं अपने बच्चे के टीवी देखने से। जिसको देखो यही शिकायत करता है कि हमारा बच्चा टीवी से चिपका रहता है पर इस आदत के जिम्मेदार भी अभिभावक ही है। घर में एक टीवी काफी होता है पर दिखावे में जरूरत न होने पर भी दो-तीन टीवी खरीदे जाते हैं। फिर एक टीवी ड्राइंग रूम के लिए, एक बच्चों के कमरे के लिए, एक बेडरूम में उपलब्ध करा दिया जाता हैं। जब चीज हर समय बच्चे को उपलब्ध होंगी तो वह टीवी देखेगा ही।

यही नहीं, अगर अभिभावक टीवी के सामने अपना मनपसंद प्रोग्राम देखने के लिए चार-पांच घण्टे बैठ सकते हैं तो आप बच्चे को किस तरह मना कर सकते हैं। इसलिए अभिभावकों का फर्ज है कि वे बच्चों के सामने अच्छे उदाहरण पेश करें? तभी बच्चे से अच्छे उदाहरणों की अपेक्षा करें।

एक और महत्त्वपूर्ण बात है बच्चे को समय देना जिसका आजकल के अभिभावकों के पास अभाव है। नौकरों के बीच पल कर बच्चा क्या अनुशासन सीखेगा? जो अभिभावक बच्चे को वक्त नहीं दे सकते, वे उसे पैसे के बल पर सभी सुख-सुविधाएं कम्प्यूटर, कार आदि उपलब्ध करा देते हैं और यह ध्यान तक नहीं देते कि बच्चा उन सुविधाओं का उपयोग कर रहा है या दुरूपयोग और फिर बच्चे की अनुशासनहीनता, गलत व्यवहार के लिए बच्चे को ही जिम्मेदार ठहराते हैं जबकि इसमें दोष पूर्णत: अभिभावकों का ही होता है।

अगर आप चाहते हैं कि बच्चा अपनी अच्छी पहचान बनाए, लोग कहें कि इस बच्चे को अच्छी तरह परवरिश मिली है तो आप इसमें बच्चे के सही मददगार सिद्ध हों और उसके दोस्त बन कर उसका सही मार्गदर्शन करें।

- सोनी मल्होत्रा

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