जीवन में संधिकाल की समस्याओं से जूझती नारी

जीवन में संधिकाल की समस्याओं से जूझती नारी

इफ स्प्रिंग कम्स, कैन ऑटम बी फार बिहांइड'। कवि शैली की इस पंक्ति में जीवन का यथार्थ बयां है। नारी के जीवन में भी बसंत आता है पतझड़ का संदेश लेकर। देखते ही देखते बसंत ऋतु बीत जाती है। फिर आता है पतझड़, अपने में ढेर सी उदासी और थकावट लिये।

प्रौढ़ावस्था में जहां जीवन में एक खालीपन सामने लगता था वहीं सामाजिक व पारिवारिक दायित्वों का बोझ कम नहीं होता था। कुछ यूं भी होता है कि उन्हें दायित्वों से घिरे रहने व उन्हें ओढ़े रहने की आदत सी हो जाती थी।

संयुक्त परिवार में रहते हुए बहुओं पर हुक्म चलाना और नाती पोतों की देखरेख में लगे रहना उन्हें उम्र से पहले ही बूढ़ा बना देता था पर आज बदलाव की लहर उठने पर अधेड़ उम्र की महिलाओं के रहन सहन, मानसिकता और व्यवहार में व्यापक बदलाव आया है। आज की सास टिपिकल परंपरावादी सास जैसी कतई नहीं दिखती, न दादी, नानी पहले वाली दादियों नानियों की इमेज से मेल खाती हैं।

उन्होंने अपना पुरातनपंथी चोला उतार फेंका है। उनका नया मंत्र बॉटोक्स द्वारा कायाकल्प, फर्राटे से चलाती गाडिय़ां, किटी पार्टीज, शॉपिंग मॉल की सैर, गिगोलोज के साथ मन बहलाव और वो सब कुछ कर पाना है जो कभी अकल्पनीय था।

पैंतालीस वर्षीय अंजलि भार्गव को लें। वे दिल्ली में एडवोकेट हैं। पेचीदा से पेचीदा केस लड़ती हैं और जीतकर दिखाती हैं। जीवन में खुशियां ढूंढने में माहिर हैं। उसे पूरी तरह एंजॉय करती है। ग्रूमिंग के लिए, फिट रखने के लिए उनके पास निजी टेऊनर आता है। जवान लड़कों का साथ उन्हें जिंदादिल रखता हैै। वे कहती हैं, 'मैं फिर से जवान महसूस करना चाहती हूं। ऐसा क्यों ंहै कि पुरुष ही चालीस पार आकर अफेयर्स चलायें, सैक्स एंजॉय करें। मैं इस बात को नकारती हूं कि चालीस पार जवानी खत्म हो जाती है, जवानी क्या बल्कि जीवन ही खत्म हो जाता है।

हाल ही में हुई एक शोध रिपोर्ट के अनुसार अधेड़ावस्था में स्त्री पुरूष के एटीट्यूड में अंतर होता है। स्त्रियां भविष्य को लेकर पुरुषों से दोगुना ज्यादा आशावादी रहती हैं। ऐसी स्त्रियों की तादाद बढ़ी हुई है जो सोचती हैं कि अधेड़ावस्था में मौज मस्ती कर ली जाए इससे पहले कि वे पूरी तरह बुढ़ापे की चपेट में आ जाएं।

कुंद्रा द्रविड़ जो एक जिम चलाती हैं, बताती हैं कि आज चालीस से ऊपर की औरतों की हमारे यहां भीड़ बढ़ती ही जा रही है। दो तीन शिफ्ट लगाने के बावजूद हमें कईयों को निराश लौटाना पड़ता है।

रजोनिवृत्ति अब न सैक्स से विरक्ति है, न जीवन से निर्लिप्त होने का वक्त। झुर्रियोंं के लिए एंटी एजिंग क्लीनिक हैं, तरह-तरह के क्रीम लोशन, जिनसे स्किन की देखभाल होती है, बालों के लिये तरह-तरह के हेयर डाई, विग, हेयर इम्लांट थेरेपी हैं। योग, मेडिटेशन भी तनावमुक्त रखने में सहायक है, यह बात बढ़ती उम्र की महिलाएं खूब समझने लगी हैं।

दो जवान बेटों की मां रानी विर्दी जीवन से भरपूर रहती हैं। वे उदासी को पास नहीं फटकने देती। खूब ठहाके लगा कर हंसती खिलखिलाती हैं और अपने आसपास के माहौल को गरमाये रखती हैं। उनके अनुसार आप स्वयं को जैसा महसूस करेंगी, वैसा ही दिखेंगी। यदि आप अपने को युवा मानकर अपने लुक्स की तरफ और अपने पहनावे की तरफ उदासीनता न बरतें, चुस्त, एनर्जेटिक महसूस करें तो वास्तव में आप वैसी ही नजर आयेंगी। इसका अहसास आपको भीतर बाहर से तरोताजा रखेगा।

मनोचिकित्सक सुविधा लाहिड़ी कहती हैं कि महिलाएं अब संधिकाल के इस क्राइसिस से सकारात्मक रूप से निपट रही हैं। बच्चों के बाहर चले जाने के बाद वे अपने कैरियर पर ध्यान देने की कोशिश में जुट जाती हैं। ये वे महिलाएं हैं जिन्होंने कैरियर को नहीं बल्कि परिवार को अपनी प्राथमिकता माना था। तथापि जहां तक रिश्तों का सवाल है, उन्हें लेकर वे उदास और निराश रहती हैं। खासकर वैवाहिक जीवन में आने वाली ऊब व ठंडापन उन्हें पुरूष प्रशंसक ढूंढने पर मजबूर कर देता है। जब उनके अफेयर्स चल जाते हैं तो कारण सैक्स से ज्यादा भावनात्मक संतुष्टि की खोज होती है।

जो औरतें अफेयर्स का रिस्क उठाती हैं वे समाज की परवाह नहीं करती। अब तक घर परिवार की जिम्मेदारियों के बोझ तले दबी वे अपनी पहचान ही भूल गई थीं। अब जब उन्हें आज़ादी से सांस लेने की फुर्सत मिली है, वे अपनी पहचान ढूंढने में जुट जाती हैं। वे जीवन का लेखा जोखा करते हुए तय करती हैं कि उन्हें क्या करना है, किस तरह सुख व आत्मसंतुष्टि के लिये एक साथ कार्य करना है, अपनी जिन्दगी का पुनर्निर्माण कर।

दरअसल चालीस पार का तनाव, भटकते पति की बेरूखी, बच्चों की उदासीनता', रिश्तों से मोहभंग, चीज़ों का बासीपन, जीवन की एकरसता, बदलते जमाने के तेवर, ये सब बातें किसी भी महिला को तोड़ कर रख देने के लिए बहुत हैं लेकिन जहां मुश्किलें होती हैं, राहें भी निकल आती हैं।

महिलाओं के साथ भी ठीक ऐसा ही हुआ है। व्यक्तिगत और प्रोफेशनल दोनों ही मोर्चो पर वे डटकर मुकाबला कर रही हैं। एक तरफ व्यक्तित्व संवारना, जमाने के साथ कदम मिलाकर चलना, हर तरह की नॉलेज प्राप्त करना, दूसरी तरफ प्रोफेशन में भी कमतर न रहना, वे चारों तरफ हाथ पैर मारते हुए वैतरणी पार करने में जी जान से जुट गई हैं।

पुरूष समाज के लिये अपनी मानसिकता बदल पाना इतना आसान नहीं है। हालांकि अब उनकी सोच में भी बदलाव आ रहा है लेकिन यह बदलाव कम, मजबूरन स्वीकार करने जैसा ज्यादा है। जो महिलाओं के पक्ष में जोरदार आवाज में बोलते हैं, वहां भी सच्चाई कम नजऱ आती है।

खैर, महिलाओं के ये तेवर स्वागत योग्य हैं जो उन्हें नयी ऊर्जा तथा कार्यक्षमता प्रदान कर रहे हैं किंतु शिष्टता, शालीनता, शर्मो हया और नैतिक मूल्यों से अगर वे सजी रहें। नारी सुलभ भावनाओं जैसे संयम, धैर्य, करूणा, ममता, क्षमा का परित्याग न करें, तभी वे सच्चे अर्थों में नारी कहलाने की हक़दार होंगी।

- उषा जैन 'शीरीं'

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