मां को फोकट की नौकरानी न समझें

मां को फोकट की नौकरानी न समझें

एक कड़वा सच क्या महज आंख मूंद लेने से गायब हो सकता है या झुठलाया जा सकता है? हमारे देश में संयुक्त परिवार तेजी से टूटते जा रहे हैं, फिर भी लाखों परिवार ऐसे हैं जहां बुढ़ापे में कोई और सहारा न होने के कारण मां बाप, बेटे-बहू पर आश्रित रह रहे हैं, कभी दो रोटी के लिए तो कभी चल फिर न पाने की त्रासदी लिए।

शहरों में ज्यादातर महिलाएं नौकरी पेशा हैं। बच्चों की देखभाल, गृहकार्य उनके लिए भार हो जाता है। कुछ बदली मानसिकता, जो उन्हें सिर्फ अपने और अपने ही लिए सोचना सिखाती है, कुछ वक्त की कमी और कामचोरी की आदत, उन्हें नौकरानी या एक अदद आया की सख्त जरूरत रहती है। आया एक तो महंगी बहुत पड़ती है, दूसरी सिंसियर नहीं होती। मेम साहब की डेऊसिंग टेबल पर धावा बोलना, मुन्ने के फल दूध उड़ा जाना, जरा-सा रोने पर बच्चे की पिटाई कर, आंखें तरेर, उसके मन में खौफ पैदा करना, ये सब बातें आयाओं की फितरत मानी जाती है।

ऐसे में सास बहुत काम आ जाती है। अगर वह स्वस्थ और मेहनती हो तो कहना ही क्या। यहां न तनख्वाह देनी पड़ती है, न चोंचले करने पड़ते हैं। रोज-रोज की धमकियों का डर भी नहीं होता।

बहू को क्या कहा जाए जब अपना सिक्का ही खोटा हो। आज निन्यानवे प्रतिशत लड़के बीवी के पल्लू से बंधे मां की घोर उपेक्षा करते हैं। उनकी पत्नी खुश रहनी चाहिए ताकि उन्हें वह शारीरिक सुख और मानसिक तृप्ति देती रहे।

घर-घर की आज यही कहानी है। मां की उम्र का लिहाज किए बिना उसे हर समय या तो कार्य में लगाये रखना या मुंह बंदकर किसी अंधेरी कोठरी के कोने में अदृश्य रहने की कठोर आज्ञा दे दी जाती है। वही बोली जो बच्चे को चुप कराती हुलसाती थी,आज नये संबंधों के जुड़ते ही जहर बुझी लगती है।

जवानी की उम्र ही ऐसी होती है। व्यक्ति उम्र के इस दौर में जवानी के नशे में चूर किसी की परवाह करता ही कहां है लेकिन क्या मां भी 'किसीÓ दायरे में ही आ जाती है?

ऐसे में मौत से पहले ही वह पल-पल मौत की त्रासदी झेलती है। बगैर आत्मसम्मान, हर पल अपमानित होते हुए मोहबंधन स्वत: ही कटने लगते हैं। उम्र के पड़ाव के ये आखिरी दिन पहले गरिमामय होते थे, इसी लिए औरत सास बनने से खौफ नहीं खाती थी बल्कि वह इस दिन की खुशियों को सोचते बेटे के ब्याह के सुनहरी सपने बुना करती थी। उन सपनों में आज आग लग चुकी है। लोक लाज और जगहंसाई बेटे, बहू और सास को औरों के सामने एक नकली मुखौटा ओढऩे पर मजबूर किए रहते हैं।

बेटे बहू की झिड़कियां, फटकार लांछन, प्रताडऩा सहती विवर्ण चेहरा लिए फोकट की नौकरानी कितनी करूणा की पात्र लगती है। वह केवल सपने में ही बीते दिन याद करती है जब वह इस घर की रानी हुआ करती थी।

- उषा जैन शीरीं

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