घर परिवार: जब बच्चा वहमी या सनकी हो

घर परिवार: जब बच्चा वहमी या सनकी हो

कभी कभी बच्चे एक ही अनचाहे ख्याल या काम को बार बार दोहराने लगते हैं हमें लगता है बच्चा वहमी या सनकी हो गया है जबकि ऐसे बच्चों को अपने व्यवहार पर कंट्रोल नहीं होता। कुछ भी काम खत्म करने पर बार बार देखेंगे कि पूरा काम खत्म हुआ या नहीं। किसी भी काम की धुन सवार होना किसी को भी सनकी बना देता है उसे आब्सेसिव कंप्लसिव डिस्आर्डर (ओ सी डी) कहते हैं। ऐसे लोग जरूरत से ज्यादा चिंतित रहते हैं और दूसरों को भी चिंता में डाल देते हैं।

ओ सी डीे के दो भाग होते हैं, पहला ऑब्सेशन और दूसरा कंपल्शन।

क्या है ऑब्सेशन:-

जब किसी बच्चे को कोई खास तरह का विचार दिमाग में बार-बार आए और लगातार आता रहे, उसे ऑब्सेसिव चाइल्ड कहते हैं। ये ख्याल इस प्रकार के हो सकते हैं:-

- किसी भी तरह की गंदगी के संपर्क में आने की चिंता।

- किसी और को नुकसान पहुंचाने का डर।

- ज्यादा अंधविश्वासी होना या तो किसी चीज को भाग्यशाली मानना या दुर्भाग्यशाली मानना।

- अपनी और परिवार की हर चीज को सलीके से लगाने की कोशिश, बेतरतीब होने पर गुस्सा आना।

- ज्यादा शक्की होना।

- धार्मिक और नैतिक विचारों पर पागलपन की हद तक ध्यान देना।

क्या होता है कंपल्शन:-

कंप्लसिव ऐसा व्यवहार है जिसे आप बार-बार दोहराने का प्रयास करते हैं जबकि आमतौर पर कंपल्श्ेान आब्सेशन से छुटकारा पाने की कोशिश के तहत किया जाता है, फिर भी यह सिलसिला जारी रहता है जैसे हाथ धोना। बार-बार हाथ इसलिए धोए जाते हैं ताकि बैक्टीरिया खत्म हो जाएं पर धोने पर तसल्ली न होना। पुन: इसे दोहराना कि शायद अब मुक्ति मिल जाएगी पर नहीं। ऐसा करने पर इसका प्रभाव बच्चे के व्यक्तिगत विकास पर भी पड़़ता है और बच्चे का आत्मविश्वास डगमगाने लगता है।

माता-पिता को चाहिए कि बच्चे का आत्मविश्वास बढ़ाएं और टीचर को इस बारे में भी बताएं ताकि वह भी बच्चे पर ध्यान रख सके।

ओ सी डी बच्चों के लक्षण:-

- फर्नीचर, स्टडी टेबल और अलमारी को बार-बार सलीके से लगाना।

- कुछ भी लिखकर बार-बार मिटाना, बार-बार किसी चीज को पढऩा।

- चीजों को बार-बार जांचना जैसे ताला, गैस, स्विच आदि।

- बार-बार गिनती करना, कुछ शब्दों को बार-बार दोहराना।

- दरवाजे, नल को बार बार चेक करना कि सही बंद हुए हैं या नहीं।

- बार-बार हाथ धोना, नहाना।

- जरूरत से ज्यादा प्रार्थना करना, धर्म से डरना।

- फालतू की चीजों को संभाल कर रखना।

माता-पिता का रोल:-

- ऐसे बच्चों को नार्मल बच्चों की तरह ट्रीट करना। उसे महसूस न होने दें कि उसमें कोई दिक्कत है।

- ऐसे बच्चों का पता चलते ही इलाज कराएं, देर न करें।

- बच्चे के साथ तालमेल बनाएं ताकि वह अपनी समस्या बेहिचक आपके साथ डिस्कस कर सके। शांति से उसकी पूरी बात सुनें, फिर समाधान करें।

- घर का वातावरण ऐसा बनाएं कि बच्चे हर बात आपसे शेयर कर सकें और मदद मांगने में हिचकिचाएं नहीं। ऐसा वातावरण बनाना माता-पिता का कर्तव्य

है।

- कई बार बच्चे बात नहीं करना चाहते तो थोड़ी हमदर्दी, अपनापन दिखाकर उनका विश्वास जीतें ताकि वह आपसे खुल सके।

- बच्चे को डांटें नहीं। कभी कभी उनकी तसल्ली हेतु कहना पड़ता है कि तुम सही हो और वह गलत है।

- अगर बच्चा किसी एक काम को बार-बार कर रहा है तो उसे प्रयास कर किसी अन्य काम में लगाएं। कभी अपनी हेल्प के लिए, छोटे भाई-बहन की मदद के लिए और कभी दादा- दादी अगर साथ हैं तो उनकी मदद के लिए ताकि उसका ध्यान उस काम से हट जाए और दूसरी तरफ ध्यान लगा सके।

- दूसरे बच्चों के साथ इनडोर, आउटडोर गेम्स खेलने के लिए प्रोत्साहित करें ताकि मन दूसरी ओर लग सके और आत्मविश्वास भी बढ़ सके।

- बच्चे के ऐसे व्यवहार की वजह दिमाग में केमिकल्स के बदलाव हैं। कई बार दवाओं की जरूरत भी पड़ सकती है।

- ऐसी समस्या पर्सनैलिटी से संबंधित नहीं होती, दिमाग से जुड़ी होती है। इसलिए इलाज की जरूरत पडऩे पर अवश्य समय पर इलाज कराएं।

- मेघा

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