आधुनिकता में उलझ रहा रक्षासूत्र

आधुनिकता में उलझ रहा रक्षासूत्र

भारतीय संस्कृति में त्यौहारों का विशेष महत्व है। त्यौहार हमारे रिश्तों के बंधन को मजबूत बनाते हैं। इसी क्रम में भाई और बहन के पवित्र रिश्ते को अटूट बनाने का पर्व है रक्षाबंधन। राखी के पवित्र धागों का त्यौहार रक्षाबंधन भाई बहन के अपार स्नेह का प्रतीक होने के साथ ही प्रतिज्ञा और बलिदान का अटूट बंधन भी है।

सदियों से जब जब बहनों पर विपत्तियां आयी, उन्होंने अपने भाइयों को स्मरण किया और रक्षा के लिए पुकार की। दिन-प्रतिदिन नारियों पर जुल्म और अत्याचार बढ़ता गया और भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर वे उनसे वचन लेने लगी कि वे उन पर हो रहे अत्याचारों से उनकी रक्षा करें।

सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक परंपरा में रची बसी इस भावना में दोनों पक्षों का निस्वार्थ प्रेम समाहित है। एक ओर जहां भाई अपनी बहन की रक्षा का संकल्प लेता है, वहीं बहन अपने भाई की दीर्घायु और कल्याण की मंगल कामना भी करती है।

हमारे पर्वों और त्यौहारों की विशेषता रही है कि इनके माध्यम से ही परिवार-प्रणाली और समय-समाज का नवनिर्माण और विकास होता है परंतु आज प्रश्न उठता है कि क्या हम इस विकास को कायम रख सके हैं? कहीं काल के प्रवाह में पश्चिमी देशों के प्रभाव से हम अपनी अमूल्य विरासत और संस्कृति को भुला तो नहीं रहे हैं? क्या इस भौतिकवादी भागदौड़ से भरी दुनिया में अन्य रिश्तों की भांति भाई-बहन के राखी के पावन सूत्रों का यह त्यौहार भी लगभग दिखावे का पर्व तो नहीं बनता जा रहा है?

वर्तमान पीढ़ी इतनी अधिक भौतिकवादी हो गई है कि उसे प्रत्येक बात का औचित्य-अनौचित्य जानने की जिज्ञासा होती है। राखी के औचित्य पर भी आज सवाल उठाया जाता है-'अगर भाई अपनी बहनों की रक्षा करना चाहते हैं तो उन्हें इसकी याद दिलाने की क्या जरूरत है? बदलते परिवेश और बदलते सोच से हमारी युवा पीढ़ी में जबरदस्त बदलाव आया है।

आज नारी पुरूषों की बराबर की भागीदार है और इस तथ्य को उचित बताना एक कठिन काम है कि कलाई में बांधे गए ये रेशमी धागे क्या वास्तव में इतने शक्तिशाली हैं कि वह अपनी रक्षा करता हुआ बहनों की भी रक्षा कर सके। आज के बनावटी जीवन का प्रभाव इस पर्व पर भी स्पष्ट दिखाई देता है।

बहनों द्वारा बनाकर बांधे गये सूत के रेशमी धागे के अपार स्नेह, आशीष और मंगल कामनाएं पिरोई हुई होती थी लेकिन अब अनेक प्रकार की सामग्रियों से तैयार राखियों ने उनका स्थान ले लिया है। बात अगर समयानुसार कलात्मकता की अभिव्यक्ति तक ही सीमित रहे, तब तो ठीक है परंतु भौतिकवाद, दिखावेपन और कृत्रिमता के मायाजाल ने इस पवित्र रक्षा सूत्र को व्यावसायिकता के शिकंजे में जकड़ दिया है। चांदी-सोने के धागों-जरी से बनी तथा हीरे-पन्ने व अन्य बहुमूल्य रत्नों से जड़ी राखियां आज बाजार में पैर पसारकर रिश्तों से जुड़ी भावनाओं और संवेदनाओं पर कुठराघात कर उसे रूपए-पैसे से आंक रही हैं।

इसके चलते प्रतिस्पर्धा में भाई-बहनों के इस त्यौहार में निहित पवित्र भावना ही लुप्त हो रही है। बनावटीपन और भौतिकतावाद की चकाचौंध में इन पवित्र धागों की प्रासंगिकता धूमिल पड़ रही है। बौद्धिकता और आधुनिकता के दुष्चक्र में फंसकर जीवन की सरस आस्थाएं भी खत्म हो रही हैं।

ऐसे में आज आवश्यकता है भाई-बहन के पवित्र रिश्ते में छिपी भावनाओं और संवेदनाओं को समझने की। इस रिश्ते की दीवार धन-दौलत की बुनियाद पर नहीं रखी जा सकती, इसे तो स्नेह, प्रेम, त्याग और समर्पण के मजबूत धरातल पर ही खड़ा किया जा सकता है। इस पवित्र प्रेम एवं स्नेह के बंधन को मात्र औपचारिकता और रूढि़वादी मान लिया जाना, राखी की पावन डोरी और रिश्तों से खिलवाड़ है।

- उमेश कुमार साहू

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