घर परिवार: कहीं बच्चा एडीएचडी का शिकार तो नहीं

घर परिवार: कहीं बच्चा एडीएचडी का शिकार तो नहीं

एडीएचडी बच्चे एक जगह टिक कर मन या ध्यान लगाकर काम नहीं करते बल्कि इधर-उधर झांकना, काम में मन न लगना, किसी की न सुनना, दूसरों को परेशान करना उनका स्वभाव होता है। एडीएचडी का पूरा अर्थ है अटेशन डेफिशिट हाइपरएक्टिविटी डिस्आर्डर। ऐसे बच्चों पर पढ़ाई के अलावा सोशल लाइफ पर भी बुरा असर होता है।

कैसे पहचानें:-

- लाइन तोडऩा, बारी का इंतजार न करना आदि।

- भावनाओं पर नियंत्रण न रख पाना।

- लगातार किसी एक जगह पर न टिकना।

- आसानी से ध्यान भटकना।

- कोई भी काम बिना सोचे समझे करना।

- लगातार बातें करना और इधर-उधर दौडऩा।

- अपना सामान संभाल कर न रखना, चीजें भूल जाना।

- एक काम को छोड़कर दूसरे काम में लगना।

- बार-बार शरारत करने की तरकीब सूझना।

- दूसरों को परेशान करना।

क्या करें:-

- बच्चे के अच्छे गुणों को ढंढें और उनकी प्रशंसा करें। उनकी कमियों पर बार-बार बात न करें।

- बच्चे की बात को ध्यान से सुनें और बच्चों के साथ बातचीत का सिलसिला बना कर रखें।

- उसके मन को किसी पॉजिटिव काम में लगाएं। उसकी हॉबी को आगे बढ़ाने में मदद करें।

- बच्चों के टाइमटेबल में थोड़ा हेरफेेर कर लगातार पढऩे के लिए जबर्दस्ती न बैठाएं। थोड़ा ब्रेक देते रहें। इससे वह बोर नहीं होगा।

- माता-पिता अपने गुस्से को काबू में रखें। बार-बार डांटने या मारने से बच्चा विद्रोही हो जाता है।

- बच्चे को अहसास कराएं कि आप उससे प्यार करते हैं पर उसके गलत व्यवहार को पसंद नहीं करते। फिर भी उसे नजरअंदाज न करें।

- यह खराब बिहेवियर की समस्या नहीं है। न ही सिर्फ लड़कों में होती है। आजकल के बच्चे माता-पिता का ध्यान अपनी ओर चाहते हैं। अगर सही इलाज करवाया जाए तो समस्या जल्दी ठीक हो जाती है।

- बच्चों को कभी उनके दोस्त,सगे संबंधी के सामने ज्यादा टोका-टाकी न करें,बस नजर रखें अगर कुछ गलत लगता है तो उसके पास जाकर प्यार से समझाएं।

- दूसरे बच्चों के साथ शेयर करना सिखाएं और दूसरों की केयर भी।

परवरिश के कुछ खास टिप्स:-

- बच्चों को उनके अपने सपनों को पूरा करने दें। अपने सपने और चाहतें उन पर न थोंपे। उन्हें कुछ आजादी दें। बच्चे की काबिलियत और पसंद पर ध्यान दें।

- बच्चों के आगे अपना व्यवहार ऐसा रखें ताकि वह आपके व्यवहार से कुछ सीखें। अगर आप उनका व्यवहार सही चाहते हैं तो पहले स्वयं मॉडल बनें, क्योंकि बच्चे अपने आस-पास से जो देखते सुनते हैं वही उनके दिमाग में बैठ जाता है। किसी जिद पर न अड़ें, न गाली गलौज दें, न ही छोटी बात पर आपस में लड़ें, न ही परिवार के अन्य सदस्यों की निंदा उनके सामने करें।

- घर के कुछ फैसलों में उन्हें शामिल करें ताकि वे भी उन्हें पूरा करने में अपने जिम्मेदारी निभा पाएं। इससे बच्चों में आत्मविश्वास बढ़ता है और सही फैसला लेने की सीख भी मिलती है।

- बच्चों को ओवर प्रोटेक्ट न करें इससे बच्चों में आत्मविश्वास की कमी आती है। बच्चों की जिंदगी में या काम में अधिक दखलअंदाजी न करें। इससे बच्चा विद्रोही, चिड़चिड़ा बन जाता है।

- नीतू गुप्ता

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