वर्तमान युग में अंधविश्वासी महिलाएं

वर्तमान युग में अंधविश्वासी महिलाएं

कल दोपहर जब मैं उषा भाभी के यहां पहुंचा तो देखा उनके आगे पोस्टकार्डों का ढेर लगा है और वे लिखने में व्यस्त हैं। उनकी 14 वर्षीय पुत्री रमा भी उनकी सहायता कर रही है। देखते ही मैंने कहा-अरे भाभी, इतने सारे कार्ड कहां लिखे जा रहे हैं। कोई आमंत्रण पत्र भेज रही हो क्या?

बैठो विवेक, बताती हूं। मैं प्रश्न भरी दृष्टि से उन्हें देखने लगा। वो क्या है कि कल डाक से हमारे यहां एक कार्ड आया उसमें लिखा था कि संतोषी माता के इस कार्ड को प्राप्त करने के एक सप्ताह के अंदर आप इसी तरह के एक सौ इक्यावन कार्ड भेजें नहीं तो आपका बड़ा अनिष्ट होगा।

अरे भाभी, क्या तुम इस तरह की थोथी बातों में अपना समय बर्बाद कर रही हो। तुमने पढ़ लिखकर क्या भाड़ झोंका है।

उषा भाभी की तरह और भी कई महिलाएं हैं जो मुझे कुछ सोचने के लिए बाध्य कर देती हैं। मैडम पूनम पिछले सप्ताह ही दिल्ली से आई हैं। आज उनके घर सत्यनारायण की कथा है। यात्र की सफलता के लिए उन्होंने यह मनौती कर रखी थी। वंदना जी के घर आज जगराता है। एक अंग्रेजी विद्यालय की अध्यापिका हैं जो लाउडस्पीकर लगाकर कीर्तन पार्टी बुलाकर जगराता करा रही हैं। बेटा हायर सैकेण्डरी में प्रथम आया है। सुनीता जी अपने भाई के स्वास्थ्य लाभ की खुशी में कीर्तन करा रही हैं।

वार्ड सदस्या मंजु जी के दायें हाथ पर कोई ताबीज बंधा है जिसे वे ब्लाउज की बॉह में छुपाने का बार-बार प्रयत्न कर रही हैं। किशोरी अग्रवाल कालेज जाने से पहले रोज़ मंदिर जाती हैं। इस चक्कर में कई बार कालेज का कोई न कोई पीरियड छूट जाता है। उनकी बड़ी बहन रोज सुंदर कांड का पाठ करने में घंटा लगाती है। इस कारण कई बार उनके बच्चे बिना नाश्ता किये विद्यालय चले जाते हैं। महिला प्रसार पदाधिकारी रेखा जी शुक्रवार के व्रत का उद्यापन कर रही हैं। पिछले कई वर्षों से अमेरिका में रहने वाली डॉ. रेणुका प्रति वर्ष देवी जाने के लिए भारत आती हैं।

ऐसे आयोजनों में मिलने वाली सभी महिलाएं ऊपरी रहन-सहन में पूर्ण आधुनिक हैं। येे नये फैशन तत्काल अपनाती हैं। अति आधुनिक वेश विन्यास वस्त्र, पहनावा, गहने और अंग्रेजी भाषा में बच्चों को डांटना, सहेलियों से बतियाना, ये सब प्रगति के लक्षण इनके पास होते हैं। यह सब भी दुखदाई नहीं, हमारी प्रगति यात्र का एक पहलू ही है पर हैरानी तब होती है जब महिलाओं को अंधविश्वासों के सागर में उसी तरह डूबा देखता हूं जिसमें हमारी दादी, नानी डूबी होती थी।

वे तो शिक्षित हैं। एम.ए., बी.ए., पी.एच.डी., एम.बी.बी.सी., एस.एल.बी., आदि सभी डिग्रियां इनके पास शीशे में मढ़ी रखी हैं। छोटी से छोटी बात के लिए मनौती कर लेना, जरा से दु:ख में मूर्ति के समक्ष दौड़ कर खड़े हो जाना, साधु संतों, तंत्र-मंत्र, ताबीजों की ओर झुक जाना, व्रत उपवास करना उनकी कमजोरी, हारी हुई मानसिकता का द्योतक है।

हर क्षण किसी आगत संकट के लिए दु:खी और शंकित रहकर अपने स्वास्थ्य को हानि पहुंचाने के सिवा और मिलता ही क्या है ?

- संजय कुमार 'सुमन'

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