दुल्हन एक, रूप अनेक

दुल्हन एक, रूप अनेक

'बाबुल की दुआयें लेती जा.....' जी हां, दुल्हन जब अपने बाबुल की देहरी से निकलती है तो बाबुल यानी पिता की दुआएं तो साथ लेती ही है और लेती जाती है अपनी संस्कृति की परंपराओं को। दुल्हन बनना किसी भी लड़की के सौंदर्य की पराकाष्ठा है। वह हर तरह से सुंदर लगे, ऐसा प्रयास रहता है।

भिन्न-भिन्न धर्म, प्रदेश, जाति एवं संस्कृति की झलक दुल्हन की वेश-भूषा, साज-सज्जा से झलकती है। भारत चूंकि विविधताओं का देश है, दुल्हनें भी यहां विविध रंगों एवं वेश-आभूषणों में अपने पिया के घर जाती हैं। तो आइये देखते हैं दुल्हनों के विविध रूप रंग।

सिख दुल्हन:- बड़े दिलचस्प हैं पंजाब में सिख परिवारों की शादियों के रीति-रिवाज। दिन में बारह बजे के पहले विवाह करना होता है। विवाह के दिन दुल्हन अपने मामा का दिया गुलाबी या लाल रेशमी सलवार-कमीज पहनती है। नाक में नथ, मांग में टीका, हाथों में हाथी दांत का बना चूड़ा और कलीरे (चांदी की लटकन) तथा जरी का काम किया दुपट्टा माथे पर ओढ़ती है।

'गुरू गंथ साहिब' के आस-पास चार फेरे (लख) लगाये जाते हैं जिसमें दुल्हा और दुल्हन के पल्लों की गांठ लगायी जाती है। इसके बाद दोनों मत्था टेकते हैं। तब कड़ा (एक प्रकार का हलवा) के प्रसाद का वितरण होता है। पंजाब की शादी हो और भांगड़ा न हो तो बात जमती नहीं। गुरूद्वारे में भी शादी होती है।

विदाई के बाद ससुराल में मां पानी-भरा लोटा दोनों के सिर से तीन बार घुमाकर एक-एक घूंट पीती है। दुल्हन व दुल्हे को बिठाया जाता हैं, मुंह दिखाई की रस्म होती है और फिर होता है गाना-बजाना। दुल्हन पहली बार 'कढ़ाह' बनाकर खिलाती है तथा उसे बदले में कुछ उपहार भी मिलते हैं। साल भर दुल्हन सफेद जोड़ी नहीं पहनती।

मुस्लिम दुल्हन:- शादी के दो या चार दिन पहले से दुल्हन को हल्दी लगायी जाती है। बारात के दिन उसे लाल रंग का जोड़ा पहनाया जाता है। आमतौर पर कपड़े पर सुनहरी जरी का काम होता है। नथ, बाली, अंगूठी, पाजेब, हार, मांग-टीका उसे पहनाये जाते हैं। बारात आती है, निकाह की रस्म पूरी होती है।

शाम तथा दिन दोनों प्रकार की शादी का इनमें चलन है। सुबह की कुछ रस्मों के बाद विदाई दी जाती है। दुल्हा अपने घर प्रवेश करने पर अपनी बहन को नजराने के तौर पर अंगूठी या पैसे देता है। दोनों को साथ बिठाया जाता है, फिर मुंहदिखाई की जाती है। देखने वाला सलामी के रूप में पैसे देता है।

बंगाली दुल्हन:- दुल्हन बनारसी साड़ी तथा चुनरी (चोली) पहनती है। पहले दिन शादी (बिए) तथा दूसरे दिन बासी शादी (बासी बिए) होती है। रात्रि में चौथे पहर में अग्नि के साथ फेरे लिए जाते हैं तथा अरूंधती नक्षत्र को देखकर वर दुल्हन की मांग भरता है।

इसकी दो रस्में 'राड़ी' तथा 'बारेंद्र' हैं। दुल्हन को काजल की एक डिबिया पकड़ाई जाती है। मांगलिक कार्यों की समाप्ति पर दुल्हा-दुल्हन को मिठाई खिलाई जाती है। उसके बाद कुछ खेल खेले जाते हैं तथा जूता छिपाने की रस्म भी होती है।

विदाई की बेला में दुल्हन की मां आंचल फैलाये द्वार के बाहर खड़ी होती हैं। दुल्हन चावल के दोनों को अपने हाथों से चारों दिशाओं में उछालती है और इस तरह जाती है अपने नये घर।

मराठी दुल्हन:- महाराष्ट्र में दुल्हन पहले पीली और फिर हरी साड़ी पहनकर आती है, जो समृद्धि का प्रतीक रंग है। यह साड़ी मामा के घर से आती है। हाथों में हरी चूडिय़ां तथा मोतीवाली नथ सास पहनाती है। दुल्हा व दुल्हन दोनों के माथों पर मोतियों या फूलों की बनी 'मुंडावली' पहनायी जाती हैं।

मंगल-सूत्र दुल्हन के लिए सबसे ज्यादा जरूरी होता है। गाल पर एक काला तिल बनाया जाता है, बुरी नजर से रक्षा के लिए। सांध्य बेला में सात फेरे लगाये जाते हैं। वर के घर में प्रवेश के समय वधू चावल से भरे मटके को पैर से गिराती है। वह समृद्धि के आगमन का प्रतीक माना जाता है।

गुजराती दुल्हन:- विवाह के दिन दुल्हन का श्रृंगार फूलों से किया जाता है। इससे पहले कई दिनों से हरिद्रा लेपन होता है। फूलों का बना बाजूबंद तथा गजरे से दुल्हन सजती है। पूर्व की ओर उसे बिठाकर सूर्य पाठ किया जाता है। बारातियों (जानैया) के आने पर लड़की के मामा वरमाला लाते हैं जिसे वह वर को पहनाती है। शादी का जोड़ा भी मामा देता है।

वह रेशमी 'पानेतर' साड़ी तथा पंजाबी वधू के समान हाथी-दांत से बना 'चूड़ा' पहनती हैं। पानेतर साड़ी काफी मनमोहक व रंगीली होती है। सिर पर ओढऩी (घर चौला) भी पोशाक का एक आवश्यक अंग होता है। वह वर-पक्ष अपने साथ लाता है। इसे दुल्हे के वस्त्र के साथ बांध दिया जाता है। दोनों अग्नि के सात फेरे पूरे करते हैं। एक रस्म (पहेरामणी) के द्वारा वरपक्ष के संबंधियों को उपहार सगुन के तौर पर भेंट किये जाते हैं। सामान्यत: उन्हें कपड़ा दिया जाता है। सिर पर मुकुट (मोडिय़ो) पहने दुल्हन अपनी ससुराल जाती है।

इस प्रकार विविध प्रदेशों व धर्मों-जातियों की विवाह-पद्धति के अंतर्गत वधुओं को सजाया जाता है। हैसियत, वर्ग तथा परिस्थिति के अनुसार उपर्युक्त रस्मों में कुछ कमी-बेशी भी होती है पर सार यही है कि दुल्हन केवल साज-श्रृंगार नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति विशेष की विशेषताओं को ढोती है।

- पूनम दिनकर

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