अविवाहित माताओं की त्रासदी

अविवाहित माताओं की त्रासदी

भारतीय समाज में विवाह इतना पवित्र माना जाता रहा है कि विवाह के पूर्व यदि कोई युवती गर्भवती हो जाए तो वह पतित, घृणित और माना जाता रहा है। जब से घरवालों को पता लग जाता है कि कोई अविवाहित कन्या गर्भवती हो गई, तब से उस की नारकीय पीड़ाएं शुरू हो जाती हैं। मां-बाप द्वारा, बड़े भाइयों, मामाओं द्वारा डांटा डपटा जाना और बुरी तरह पीटा जाना, भोजन आदि सामान्य सुविधाओं से वंचित रखा जाना, घर से ही निकाल दिया जाना, पूरे समाज द्वारा बहिष्कृत किया जाना, इस प्रकार की विविध प्रकार की शारीरिक और मानसिक पीड़ाओं को न्यूनाधिक मात्रा में सहना पड़ता है। इन उत्पीडऩों से गुजरते हुए कोई-कोई माता मानसिक संतुलन इस कदर खो बैठती है कि फिर जीवन में कभी मानसिक शांति की स्थिति को लौट नहीं पाती। आत्महत्या की प्रेरणा किसी में इतनी बलवती हो जाती है कि किसी न किसी प्रकार खुदकुशी कर डालती हैं। आज कल तो ऐसी माताओं को भू्रण हत्या के लिए प्रेरित किया जाता है। प्राय: ऐसे व्यक्तियों के यहां पहुंचाया जाता है जो गर्भपात की विद्या में पूर्ण रूप से प्रवीण नहीं हैं। फलत: गर्भपात की प्रक्रिया कभी-कभी माता की भी जान ही हर लेती है। बच भी जाएं तो कभी किसी, कभी किसी बीमारी की शिकार हो जाती है। सामान्य अस्पतालों में भी जहां सुयोग्य चिकित्सक, गाइनकोलाजिस्ट और सर्जन उपलब्ध हैं, ये निंदा और घृणा की दृष्टि से देखी जाती हैं। कभी-कभी इन्हें अस्पताल में दाखिला देने से ही इंकार किया जाता है। ऐसी एक क्रूर और अमानवीय घटना हाल में हुई। नेटुमंगाड तालुक अस्पताल में प्रवेश न दिए जाने पर एस. ए. टी. अस्पताल जाती गर्भवती ने ऑटो रिक्शा में एक बच्चे को जन्म दिया। सुबह छ: बजे प्रसव वेदना के शुरू होने पर बत्तीस वर्षीय सरला अपनी मां लीला के साथ अस्पताल पहुंची। डॉक्टर ने जांच के बाद एस. ए. टी. अस्पताल भेजा। मार्केट के समीप ऑटो रिक्शा स्टैन्ड पहुंचते ही सरला शारीरिक शिथिलता के कारण गिर गई । ऑटो रिक्शा वालों ने उसे ऑटोरिक्शा में चढ़ा दिया। एस.ए.टी. अस्पताल पहुंचने के पूर्व ही रास्ते में, आटो रिक्शा में ही प्रसूति हो गई। फिर निकट के एक सरकारी अस्पताल में प्रवेश कराया गया। पहले अस्पताल के डॉक्टर ने बताया कि इस सूचना के आधार पर उसे प्रवेश देने से इंकार किया गया था कि सरला अविवाहित है। सोचना यह है कि अविवाहित माताओं को इतनी अधिक पीड़ाओं का शिकार होने देना क्या मानवीय है? माना कि अविवाहित स्थिति में गर्भ धारण करना भारतीय परंपरा के खिलाफ है पर पश्चिमी जीवन मूल्यों के कुप्रभाव से ऐसी घटनाएं अब बढ़ती ही जाएंगी। हर गर्भधारण के पीछे एक पुरूष भी है, इस बात को भुलाया नहीं जाना चाहिए।
क्या प्रसूति हर मादा-प्राणी का जन्मसिद्ध अधिकार नहीं? यदि हां, तो मानव स्त्री के साथ हो रहा यह अमानवीय व्यवहार हमारे सभ्य समाज को शोभा देने वाला है?
- के.जी. बालकृष्ण पिल्लै

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