कितनी सुरक्षित हैं महिलाएं आज?

कितनी सुरक्षित हैं महिलाएं आज?

हमारे आधुनिक समाज में आज भी यह दलील दी जाती है कि निरंतर बढ़ रहे महिलाओं के साथ शोषण, छेडख़ानी, अश्लील हरकतों एवं सबसे मुख्य बलात्कार की घटनाओं के लिए स्वयं महिलाओं का रहन सहन, चाल चलन व भड़काऊ पहनावा दोषी हैं जिससे भड़ककर व आकर्षित होकर पुरूष महिलाओं की आबरू पर हमला कर देता है। कितनी भद्दी व बीमार मानसिकता है हमारे समाज की। ऐसी दलीलें देने वालों से पूछिए कि हम आधुनिक समाज में जी रहे हैं या जंगली सामाजिक व्यवस्था में कि जिसे जो पसंद आया, उसे झपट्टा मारकर पकड़ लिया और अपनी हवस की आग बुझा ली।
यदि पुरूष समाज की इस दलील को मान लें तो महिलाओं का खाना पीना, कपड़े पहनना व आजादी से स्वछंद स्वतंत्र रहने के मानवाधिकारों व महिला अधिकारों पर ही प्रश्नचिन्ह लग जाएगा। जाहिर है ऐसी दलीलें तो जंगलराज की व्यवस्था व व्याख्या की ओर इशारा करती हैं, स्वतंत्र लोकतंत्र की ओर नहीं।
मात्र पहनावा देखकर ही कोई भड़क सकता है, सामान्य स्थिति से बेकाबू हो सकता है तो फिर वह तो रोजाना ही कुछ भी देखकर बेकाबू हो जायेगा और रोजाना ही अमर्यादित, असामाजिक कार्यों को अंजाम देगा। सत्य तो यह भी है कि पुरूष अपनी हवस की आड़ में स्त्री हो या लड़की, सभी को अपना शिकार बनाना चाहता है वर्ना क्या कारण है कि सड़क चलते हजारों व्यक्तियों में मात्र वे ही बलात्कारी भड़के, अन्य नहीं? फिर हमारे यहां तो दो तीन वर्ष की अबोध बालिकाओं से लेकर साठ सत्तर वर्ष की वृद्ध महिलाओं के साथ भी बलात्कार हो चुके हैं, तो फिर मात्र पहनावा ही दोषी क्यों?
इसी प्रकार जब शहरों के सुरक्षित माने जाने वाले पॉश शहरी क्षेत्रों में ऐसी घटनाएं घट रही हैं तो फिर दूर दराज के गांवों में आदिवासी इलाकों में महिला अत्याचारों व शोषण की घटनाओं का जिक्र तो दिल दहला देने वाला है। हमारे देश में आदिवासी महिलाओं के साथ तो मजदूरी करते समय, अपने घर में रहते, काम काज हेतु अन्य कहीं स्थान पर आते जाते दैहिक व मानसिक एवं शारीरिक शोषण होना तो सामान्य सी व लगातार रोजाना होने वाली घटनाएं हैं। अनेकों बार तो इन आदिवासी महिलाओं के साथ शारीरिक शोषण व बलात्कार तक होता है। कई महिलाएं तो बिन ब्याही मां बन जाती हैं।
दरअसल दूर दराज की गांव ढाणियां हों अथवा शहरों के पॉश इलाके, इस समाज में घूम रहे वहशी दरिदों के आगे महिलाएं तब तक सुरक्षित नहीं हैं जब तक कि वे स्वयं ही मिलकर, संगठित होकर इस पुरूष प्रधान में समाज में बलात्कारियों व शोषण करने वालों को अच्छा खासा सबक नहीं सिखाएं। कानून तो लचीला है ही, साथ ही चालाक व उत्साहित शोषण करने वाले पुरूष समाज को जब तक कोई जैसे को तैसा नहीं मिलेगा, तब तक ये घटनाएं होती ही रहेंगी, अत: आवश्यकता है खुद को ही बुलंद कर शोषण से संघर्ष की।
- किशन वासवानी

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