चिरस्थायी नहीं हो पाता जिस्मानी प्यार

चिरस्थायी नहीं हो पाता जिस्मानी प्यार

सब किशोर और किशोरियों के सपने में मेंहदी-सा रचा होता है प्यार। हर युवा दिल चाहता है कि उसे प्रेम करने वाला हसीन, चुलबुला और टूट कर प्यार करने वाला हो। किसी मर्लिन मनरो या क्लियोपेट्रा सरीखी प्रेमिका का रूमानी ख्वाब उसकी आंखों में होता है। केवल कुंवारे ही नहीं बल्कि शादीशुदा जोड़े भी यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि उनके बीच रोमियो-जूलियट, सोहनी-महीवाल या लैला - मजनूं जैसा प्यार है।
प्यार के अनेक वर्गों में एक होता है रूमानी प्यार। इसे जिस्मानी मोहब्बत भी कहा जाता है। यह प्यार अधिकतर जिस्म को पाने तक का ही होता है। इसमें अधिकतर किशोरियां ही छली जाती हैं।
हाव-भाव, रूप रेखा, वचन-संकल्प आदि सभी कुछ इसमें शुद्ध प्यार की तरह ही होता है। किशोरी अपने प्रेमी की इन बातों में आकर उस पर विश्वास कर बैठती है और फिर अपना सब कुछ लुटा देती है। प्रेमिका का जिस्मानी रस चूस लेने के बाद प्रेमी उसे कवाब की हड्डी की तरह फेंक देता है और फिर वह भंवरे की तरह उड़कर दूसरी कली को फूल बनाने का प्रयत्न करने लगता है। यह आवश्यक नहीं है कि रूमानी प्यार में सिर्फ किशोरियां ही तबाह होती हैं। कई बार तो युवक भी युवतियों के द्वारा जिस्मानी प्यार के शिकार होते देखे गए हैं। शादी-शुदा युवक व युवतियां भी जिस्मानी हवस को मिटाने के लिए ऐसा करते देखे गए हैं। भले ही रूमानी प्यार का तौर-तरीका कुछ भी हो परन्तु मुसीबत प्राय: युवती को ही उठानी पड़ती है।
दरअसल, रूमानी प्यार चिरस्थायी इसलिए भी नहीं हो पाता क्योंकि यह ठोस यथार्थ की जगह कपोल कल्पनाओं पर टिका होता है। इस ख्वाब का रंग उतरते ही रूमानी प्यार भी हवा हो जाता है। आमतौर पर रूमानी प्यार किशोर-किशोरियों के बीच ही होता है। उनमें परिपक्वता न होने के कारण विपरीत सेक्स के प्रति व्यक्ति के सहज आकर्षण को वे प्यार समझ बैठते हैं मगर ज्यों ही वे साथ रहना शुरू कर देते हैं या दोनों में से एक के स्वार्थ की पूर्ति हो जाती है, यह आकर्षण धीरे-धीरे कम होने लगता है।
प्यार करते वक्त व्यक्ति अपने अवगुणों और खामियों को छुपा जाता है और केवल अपनी सर्वोत्तम छवि पेश करना चाहता है। परिपक्वता के अभाव में रूमानी प्यार चटकने लगता है। विवाह के बाद भी पारिवारिक दायित्व बढऩे के कारण रूमानी प्यार का नशा समाप्त होने लगता है।
अपरिपक्व युवक या युगल प्रेमी विवाह के बाद भी शुरूआती दिनों से ही विवाहित दिनों की तुलना करना चाहते हैं। परिवार में बंध जाने के बाद यह सब कतई संभव नहीं हो सकता जो विवाह से पूर्व स्वच्छन्द दिनों में होता था। पारिवारिक दायित्व के समक्ष रूमानी प्यार गौण हो जाता है। वास्तविक जीवन में यह सब संभव न होने के कारण शीघ्र ही उनका दिल टूट जाता है।
रूमानी प्यार की जगह सहज प्यार में भले ही उतनी उष्णता और प्यार की वह उग्रता नहीं होती मगर सहज प्यार में स्थायित्व होता है। काल्पनिक या स्वप्निल चीजें अधिक दिनों तक टिकी नहीं रह सकतीं। रूमानी प्यार से ऐसे सपने और अपेक्षाएं जुड़ी होती हैं जिन्हें पूरा कर पाना वास्तविक जीवन में संभव नहीं होता। इसीलिए वह अधिक दिनों तक टिका नहीं रह पाता।
रूमानी प्यार न सिर्फ अपरिपक्व ही होता है बल्कि अव्यावहारिक भी होता है। परिपक्व प्यार आपसी समझदारी और सहानुभूति पर आधारित होता है। प्रेमी-प्रेमिका या पति-पत्नी एक-दूसरे पर-शक नहीं करते बल्कि वे अपनी आपसी समझदारी के माध्यम से एक-दूसरे पर पूरा विश्वास करते हैं।
बहुत-से लोगों की यह कोशिश रहती है कि लोग उन्हें प्यार करें। पुरूषों को इसमें काफी सफलता मिलती है। 'प्यार किये जाने' का मतलब यह निकाला जाता है कि उनमें 'सेक्स अपीलÓ है। इसी क्रम में महिलाएं आकर्षक दिखने की कोशिश करती हैं और पुरूष उसे 'निमंत्रण' समझकर स्वीकार कर लेता है। पुरूष की स्वीकार भावना में 'सहज प्यार' कम और रूमानी प्यार अधिक होता है।
रोमांटिक प्रेमी-प्रेमिका अपने प्रियजन को किसी और व्यक्ति से हंसते-बोलते नहीं देख सकते। ऐसी स्थिति में वे तुरंत शक करने लगते हैं। अनावश्यक संदेह उनके जीवन में जो जहर घोलता है, उसका विषदंश किसी भी हद तक जा सकता है। इसके विपरीत परिपक्व प्रेम में आपसी विश्वास और समझदारी होती है।
उसमें दोनों ओर से यह आत्म स्वीकृति होती है कि हमारा साथी भी मनुष्य है और उसे सहज ढंग से जीवन जीने की पूरी स्वतंत्रता है। साथी को अधिकार है कि वह हमारे अतिरिक्त जिन लोगों को पसंद करता या करती है, उनसे हंसे-बोले। इस तरह की स्वीकृति रूमानी प्यार से ऊपर उठकर प्रेम करने वालों की हुआ करती है।
प्यार की आवश्यकता सही मायने में खुश रहने के लिए तथा मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए ही हुआ करती है। मित्रता, पारिवारिक बंधन या रोमांस कर रहे लोगों का मानसिक स्वास्थ्य दूसरों की तुलना में बेहतर होता है। प्यार करने की हममें जितनी अधिक क्षमता होगी, हम उतने ही ज्यादा स्वस्थ, सुन्दर और मजबूत होंगे। प्यार समर्पण चाहता है न कि अलगाव। हम चाहते हैं कि हमें कोई समझे, कोई हमारी चिंता करें तथा वह समझने और चाहने वाला व्यक्ति हमारे पास रहे।
चिकित्सा शास्त्रियों का मानना है कि प्यार के लिए दिमाग की रासायनिक क्रियाएं जिम्मेवार होती हैं। प्यार जितना गहराता जाता है उतना अधिक रासायनिक स्राव हमारे मन-मस्तिष्क में स्रावित होने लगता है। इस क्रिया से अंग-प्रत्यंग विकसित होने लगते हैं। मन प्रफुल्लित हो उठता है तथा चारों ओर हरियाली ही हरियाली दिखने लगती है। प्यार की पूजा करते हुए उससे जीवन भर आनंद उठाने वाला प्रेमी ही 'सच्चा प्रेमी' कहलाता है। रूमानी या जिस्मानी प्यार सिर्फ हवस को मिटाने के लिए ही किया जाता है, अत: इससे हर संभव बचे रहना चाहिए।
- पूनम दिनकर

Share it
Share it
Share it
Top