नारी से जलती है नारी

नारी से जलती है नारी

नारी मुक्ति का हो-हल्ला हो रहा है। प्रश्न उठता है कि नारी बंधन में कब थी? और यदि बंधन में है तो उसका जिम्मेदार कौन है? अनेक कारणों में से एक मुख्य कारण है कि नारी ही नारी की शत्रु है।
महिलाओं में ईष्र्या की वृत्ति अधिक पाई जाती है और वह भी मामूली व निरर्थक कारणों को लेकर। अमुक महिला ज्यादा सुन्दर क्यों? उसके पास वस्त्र, जेवर आदि वस्तुएं ज्यादा क्यों? उसके पति ज्यादा कमाई क्यों करते हैं? उसके बच्चे ज्यादा रूपवान व गुणवान कैसे? आदि छोटे दिमाग से उपजे विचार चलते रहते हैं।
एक स्त्री किसी तरह अन्य स्त्री से व्यर्थ की निराधार बातों में आगे रहने के कुप्रयास करती रहेगी। सौंदर्य प्रसाधनों का अंधाधुंध प्रयोग करेगी। अपने घर की हैसियत का विचार किये बिना खर्च करेगी, नई फैशन की वस्तु लायेगी या मंगवाएगी। किसी के बिना पूछे नमक-मिर्च लगाकर अपनी व अपने घर की स्थिति व परिस्थिति का सच्चा-झूठा बखान करेगी।
सास-बहू के झगड़े जग प्रसिद्ध हैं। न सिर्फ सास-बहू वरन् मां-बेटी, ननद-भौजाई, बहिन-बहिन, देवरानी जेठानी बात बेबात लड़ती झगड़ती रहती हैं। सारा पारिवारिक और सामाजिक वातावरण क्लेशमय बना देती हैं।
बेटे और बेटियों के पालन-पोषण व परवरिश का सारा जिम्मा भी नारी के ऊपर है। उसमें भी पक्षपात होता है। यहां तक कि कितनी ही माताएं मादा-शिशु को ठीक ढंग से स्तनपान भी नहीं करातीं। 'बेटियां पराई होती हैं, इन्हें ज्यादा खिला-पिला कर क्या करना?' जैसी घृणित मानसिकता व धारणा वाली औरतें मैंने देखी हैं।
बेचारा पुरूष तो अपने काम-धंधे पर होता है और उधर घर में नारी के राज में छल, कपट और नाटक चलते रहते हैं और जब वह घर लौटता है तो उसके भी कान भरने शुरू। पत्नी अपने पति से कहेगी 'आपकी मां ऐसी है, आपकी बहिन वैसी है, आदि-आदि' और उधर सास भी बहू के खिलाफ बेटे से शिकायत करेगी। पुरूष 'इधर कुंआ और उधर खा' जैसी दुविधा में पड़ जाता है। परिणाम होता है-अशांति, कलह, विघटन, हत्या, आत्महत्या और घर की बर्बादी। कारण होता है-नारी के प्रति नारी की दुर्भावना व ईष्र्या।
नारी मुक्ति अथवा नारी स्वतंत्रता के लिए स्वयं नारी को सोचना होगा। शहरी महिलाएं ग्रामीण महिलाओं के जीवन की अच्छी व उच्च बातें ग्रहण करें तथा ग्रामीण-महिलाएं शहरी-महिलाओं की श्रेष्ठताओं को स्वीकारें तो बहुत बड़ा कार्य हो सकता है। नारी ही नारी को तथा नारी की समस्याओं को ज्यादा अच्छी तरह समझ सकती है। उसका सहयोग कर सकती है।
नारी में यदि इतनी जागरूकता व सकारात्मकता आ जाए तो एक अभिनव अप्रत्याशित परिवर्तन हो सकता है। फिर एक नारी दूसरी नारी की शत्रु नहीं, मित्र बनकर व्यवहार करेगी। वह पुरूष का भी विरोध नहीं, समुचित सहकार करेगी। बच्चों को भी संस्कारित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
- उमराव देवी धींग

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