न करें पति के रिश्तेदारों की उपेक्षा

न करें पति के रिश्तेदारों की उपेक्षा

पति-पत्नी में अक्सर छोटे-मोटे झगड़े तथा मनमुटाव होते रहते हैं। ये झगड़े तथा मनमुटाव अक्सर बड़े विवादों तथा कलह को भी जन्म देते हैं जिनसे परिवार की शांति भंग होने की संभावना बनी रहती है। इन झगड़ों तथा मनमुटावों के कई कारणों में पत्नी द्वारा पति के घरवालों तथा रिश्तेदारों के प्रति सहनशीलता नहीं होना भी एक प्रमुख कारण है।
ऐसी पत्नियों को इन आदतों पर काबू रखना चाहिए। उन्हें सोचना चाहिए कि ससुराल ही उनका अपना घर है तथा शादी के बाद ससुराल वाले सच्चे हितैषी। चाहे वे जैसे भी हों, उनके अपने हैं। उस घर की मान-मर्यादा भी उसकी अपनी है तथा किसी भी हालत में उसकी रक्षा करना उनका कर्तव्य है। अगर उनके ससुराल
कीे बदनामी होगी तो उनकी भी बदनामी होगी।
कई पत्नियां ऐसी भी होती हैं जो अपने मायके से आये लोगों का तो खास ख्याल रखती हैं मगर पति के दोस्तों और रिश्तेदारों की अपेक्षा करती हैं। ऐसी हालत में तो पति को बुरा लगना स्वाभाविक ही है क्योंकि उसके सामने ही उसके परिचितों और रिश्तेदारों की उपेक्षा होती है।
पत्नी को समझना चाहिए कि अगर उसके कारण उसके पति का अपमान होता है तो यह उसका अपना अपमान है क्योंकि पति-पत्नी एक दूसरे के पूरक होते हैं। वैसे भी कोई पति अपनी पत्नी के घरवालों यथा साला-साली, सास-ससुर आदि की उपेक्षा नहीं करता है। अगर पति इज्जत करता है तो निश्चय ही अपनी पत्नी से भी उसी तरह की अपेक्षा रखता है जिसे पूरा करना पत्नी का धर्म है।
बहुत सी पत्नियों को यह शिकायत रहती है कि उनका पति केवल अपनी मां की बात ही मानता है और उसी के अनुसार चलता है। वास्तव में इस तरह की पत्नियां कुछ जरूरी बातों को भूल जाती हैं। उन्हें समझना चाहिए कि मां और बेटा तथा पति-पत्नी का रिश्ता अलग-अलग होता है। किसी पत्नी का पति किसी मां का बेटा भी होता है। शादी के पहले तक बेटा अपनी मां का ही होता है।
शादी होने के बाद क्या बेटा अपनी मां और मां अपने बेटे को भूल जायेगी? ऐसा संभव भी नहीं है और होना भी नहीं चाहिए। बेटे के जवान होने तक मां उसकी राहों में पलकें बिछाए रहती है तथा धूमधाम से उसकी शादी करती है। अगर शादी के बाद बेटा अपनी मां और पिता से मुंह मोड़ता है तो इसकी जिम्मेवारी पत्नी पर ही आती है। पत्नी और मां का अधिकार क्षेत्र अलग-अलग है और अगर उसमें अतिक्रमण किया जाये तो बेवजह ही घर की शांति भंग होगी।
कई घरों में पति जब अपनी कमाई से कुछ हिस्सा अपने भाई-बहनों तथा उनकी पढ़ाई-लिखाई पर खर्चते हैं तो पत्नियों को बुरा लगता है। उन्हें लगता है कि उसका पति ये पैसे लुटा रहा है। वे ये नहीं सोचती कि वे उसके पति के भाई-बहन हैं। अगर उसका पति उनका ख्याल और जिम्मेवारी नहीं उठायेगा तो फिर कौन उनकी तरफ ध्यान देगा।
उन्हें अपने मायके से भी सामंजस्य करके सोचना चाहिए कि अगर उसके मायके में उसके भाई तथा भाभी उसके भाई-बहनों की उपेक्षा करें और उनकी परवाह नहीं करें तो उसे कैसा लगेगा? अपने उस भाई तथा भाभी के लिए किस तरह की इज्जत और सम्मान उसके दिल में रह पायेगा। जाहिर है ऐसी भाभी और भाई के लिए उसके दिल में कोई जगह नहीं होगी।
अगर वही स्थिति उसके ससुराल में हो और वह भाभी होगी तो निश्चय ही उसका देवर तथा ननद उसके बारे में अच्छा ख्याल नहीं रखेंगे जो घर के संबंधों की नींव पर ही आघात करेगा। इस तरह की परिस्थिति में पत्नियों को समझदारी से काम लेकर अपने पति की भावनाओं का आदर कर उन्हें सहयोग करना चाहिए।
पति-पत्नी गाड़ी के दो पहिए होते हैं जिन पर घर-परिवार रूपी गाड़ी चलती है। इनमें से अगर कोई एक पहिया भी कमजोर हो जाए तो गाड़ी का संतुलन बिगडऩे का डर बना रहता है। पति-पत्नी को एक दूसरे पर विश्वास कर इस संतुलन को कायम रखना चाहिए। पत्नियों को घर-परिवार में सहयोग करना चाहिए और पति के घर वालों को पूरा सम्मान, आदर तथा प्यार देना चाहिए जो घर की शांति कायम रखने में मदद दे सकें।
- राजा पप्पू कुमार

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