जब बहू-बेटे के मित्र घर आयें

जब बहू-बेटे के मित्र घर आयें

अच्छा संगीता चलती हूं, अब तुम भी अपने पति के संग जरूर घर आना। हालांकि मैं काफी समय बाद आयी हूं, प्लीज माइंड न करना। अपनी बात चलते चलते सुनीता पूरी भी न की पाई थी कि संगीता बीच में बोल पड़ी अरे सुनीता! हम तो चाहे जब आ जायें पर आपकी माताजी (सास) बीच में बैठकर सारी बातों का मजा ही किरकिरा कर देती हैं। तुम लोग तो कुछ बोल ही नहीं पाते हो! सुनीता यह सुनकर मुस्कुराती हुई अपने पति के साथ चली गई।
यह उलाहना केवल सुनीता का ही नहीं बल्कि प्राय: परिवारों में यह देखने को मिलता है कि जब भी बेटे या बहू के मित्र या ऑफिस के सहकर्मी घर आते हैं तो कई सासें बीच में आकर बैठ जाती हैं और अपनी बातें ऐसी छेड़ती हैं कि पता ही नहीं चलता कि ये सास को मिलने आये हैं या बेटे बहू से।
हालांकि घर आये मेहमानों से मिलना-जुलना अच्छी परंपरा है। यूं भी मेहमान जब घर आते हैं तो पहले बड़े बूढ़ों की कुशलक्षेम पूछ ही लेते हैं और ऐसे बुजुर्ग सदस्य यदि बीच में आकर मेल-मिलाप करें तो कोई बुरी बात नहीं है। लेकिन पूरे समय उनके बीच में बैठना व यदाकदा बेटे बहू के तौर तरीकों की आलोचना करना व अपने को ऐसा शो करना कि जैसे उनका कोई ख्याल करता ही नहीं है ऐसी स्थिति में आगे वाला असमंजस की स्थिति में फंस जाता है कि किसके पक्ष में बोलें या फिर चुप होकर सुनता रहे।
आजकल भागदौड़ की व्यस्त जिंदगी में सच पूछिए तो किसी के भी पास इतना वक्त नहीं है कि रोज-रोज किसी के घर आना-जाना हो सके। हां फोन पर ही बातचीत हो जाती है। कभी इत्तेफाक से समय मिल गया तो एक दूसरे के घर आना-जाना हो सकता है।
कई परिवारों में घर के वृद्ध माता-पिता या सास ससुर व अन्य सदस्य घर आये मेहमानों के बीच बैठना पसंद ही नहीं करते हैं। बस शक्ल दिखाकर ही कमरे से बाहर हो जाते हैं। लेकिन कुछेक सासों की यह आदत सी बन गई है कि पुत्र या पुत्रवधू से मिलने वाले आये नहीं कि वे उनके बीच जाकर पूरे समय तक बैठकर अपनी ही गाथा गाती हैं। अब बेचारे बहू व बेटा, बोले तो क्या बोले? इतनी भी स्वतंत्रता सास नहीं देती हैं कि लो बेटा अब तुम करो बातचीत, मैं तो चली।
बहुत कम व समझदार सासें ही ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। यह बात अनपढ़ व पढ़ी लिखी दोनों सासों पर ही लागू होती है। जब ऐसी सासें घर में बाधक बन जाती हैं तो घर आने वाले मित्रों में कमी आ जाती है। फिर उन्हें कितना भी जोर देकर बुलायें कि आइयेगा, पर वह ऊपरी तौर पर तो हां कर देते हैं लेकिन मन ही मन सोचते हैं कि क्या करें जाकर वहां, अपने मित्र या सहेली से तो बातचीत हो नहीं पाती, फिर जाने का क्या फायदा।
जब ऐसी स्थिति घरों में पनपने लगती है तो बेटे बहू को भी समझदारी से काम लेना चाहिए। जहां तक बन सके आप स्वयं ही अपने उन मित्रों के घर चलें जायें ताकि खुलकर सुख-दुख के अलावा भी अन्य जरूरी बातें हो जायें। घर पर आने वाला मेहमान यह अपेक्षा कर आपके घर आता है कि वह घर के जिस सदस्य से मिलने जा रहा है, उससे ज्यादा से ज्यादा बातचीत हो सके। जहां तक सवाल है ऐसी सासों का तो उन्हें भी समझदारी दिखानी चाहिए। न केवल अपने बेटे बहू की अपितु घर आये मित्रों की भावनाएं भी समझनी चाहिए, होना तो यही चाहिए कि घर आये मेहमान की खातिरदारी के लिए बहू चाय नाश्ता लेकर आये, तब तक आप उनसे बातचीत करें व उनका हाल चाल व बच्चों की पढ़ाई व अन्य कोई समस्या हे तो चर्चा करें। तत्पश्चात चाय में साथ देने के बाद वहां से उठना निश्चित रूप से आपकी दूरदर्शिता का परिचायक सिद्ध होगा। सामने वाले को भी महसूस होगा कि कितनी अच्छी सास है जो बेटे बहू की व मेहमानों की बातों में कतई रूचि नहीं रखती है।इससे आपका ही कद बढ़ेगा व मेहमान भी दूसरों के यहां जाकर आपकी तारीफ ही करेंगे।
बहू-बेटे का भी कर्तव्य बनता है कि घर आये महमानों का परिचय अपने माता-पिता व अन्य सदस्यों से करायें। ऐसा नहीं कि आप उनकी पूरी तरह से उपेक्षा करें व ऐसी धारणा बना लें कि इन्हें बुलाने या बीच में बिठाने से क्या मतलब? कभी कभी ऐसी उपेक्षा से भी खिन्न होकर सासें अपने तीखे तेवर मेहमानों के बीच बैठकर दिखाती हैं। तब भलाई केवल चुप्पी में ही है, लेकिन ऐसा मौका न दें तो ही ठीक है। सास चूंकि उम्र में बड़ी हैं, उनका अनुभव काफी है तो यह समझदारी यदि सास ही दिखाये तो कितना अच्छा है?
- चेतन चौहान

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