सामंजस्य आवश्यक है सास-बहू में

सामंजस्य आवश्यक है सास-बहू में

हमारा सामाजिक जीवन पूरी तरह संबंधों पर निर्भर है। जीवन में संबंध जितने महत्त्वपूर्ण होते हैं, उतना ही महत्त्वपूर्ण होता है संबंधों को सफलतापूर्वक निभाना। कई बार संबंधों में कड़वापन आ जाता है परंतु धैर्य और समझ के साथ हर संबंध को कुशलतापूर्वक निभाया जा सकता है। सबसे ज्यादा कठिन माना जाने वाला संबंध सास-बहू का होता है परंतु वास्तव में यह उतना उलझा हुआ नहीं होता जितना समझा जाता है।
सास बहू में सामंजस्य होना बहुत जरूरी है। ससुराल में आने के बाद बहू से अपेक्षा की जाए कि वह हमारे अनुरूप ढल जाए तो एकदम तो ऐसा नहीं होता। अपने प्यार से उसे समझाकर बताना चाहिए कि यह कार्य तुम्हें किस तरह करना चाहिए। यदि नहीं आता तो बता दें कि यह काम किस तरह होगा।
जहां से ब्याह कर बहू आई, वहां के तौर तरीके अलग होंगे। साफ-सफाई से लेकर रसोई के काम में समयानुसार कार्य प्रणाली में बदलाव तो आएगा ही। खाना बनाने का तरीका अलग अलग होगा तो स्वाद में भी फर्क तो पड़ेगा। धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा।
सास को कभी भी मायके वालों को उलाहना या ताना नहीं देना चाहिए। आपने विवाह से पूर्व भी तो देखा भाला था। सबकी राजी खुशी से तो विवाह हुआ। बहू के आते ही सारा काम बहू पर नहीं डालकर थोड़ा-थोड़ा काम करने दें। घर के सदस्य भी यथायोग्य प्यार व सम्मान के साथ कोई काम कहेंगे तो बहू भी खुशी से काम करेगी। प्यार से बोलने में और रौब से कड़क कर बोलने में ऊर्जा व समय तो उतना ही खर्च होगा लेकिन प्यार से बोलने में विशेष क्या खर्च होगा?
बहू भी अपने कर्तव्य में सास को सम्मान दें और उसे ही अपनी मां के रुप में देखें। आपस में तालमेल बिठाकर चलें। सास ने भी तो गृहस्थी के अनुभव प्राप्त किए हैं। उन अनुभवों को बहू को फुर्सत के समय बताएं। ससुराल में रहन-सहन मायके से अलग होगा ही, धीरे-धीरे आदत डालें। जिद्दी स्वभाव नहीं रखें। सास-बेटी का एक नया रिश्ता रचें। मायके व ससुराल वालों में भी आपके द्वारा ही प्यार व सम्मान का रिश्ता बना रहेगा।
बहू को भी बेटी की तरह मानना, उसे प्यार से पुकारना बहू की सारी थकावट को दूर कर देता है। सास की बीमार अवस्था में अच्छी देखरेख करना बहू का कर्तव्य है, वहीं अगर बहू अस्वस्थ है तब सास बहू की सेवा करे तो अनुचित क्या है।
-उमेश कुमार साहू

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