दहेज प्रताडऩा की जानकारी मां-बाप को अवश्य दें

दहेज प्रताडऩा की जानकारी मां-बाप को अवश्य दें

कुछ युवतियों के मनोहारी सपने तब छिन्न-भिन्न हो जाते हैं, जब उन्हें ससुराल में दहेज के लिए प्रताडि़त किया जाने लगता है। दहेज के भूखे भेडिय़ों द्वारा अपने मायके से कीमती सामान या नकद रूपया लाने के लिए नव विवाहिताओं को शारीरिक तथा मानसिक यातनायें देना व जलाकर मार डालना अब आम बात हो गयी है।
ऐसा नहीं है कि इन दुखद घटनाओं की शिकार अनपढ़, कम पढ़ी-लिखी या बेरोजगार लड़कियां ही होती हैं बल्कि इस कहर से उच्च शिक्षा प्राप्त तथा नौकरी पेशा लड़कियां भी नहीं बच पाती हैं।
ठीक इसी प्रकार एम ए बी एड रेखा भी हाई स्कूल में टीचर थी। शादी के बाद उसे भी ससुराल में पांच लाख रूपया और कार लाने के लिए यातनाएं दी गयी। उसकी शादी को आठ महीने भी पूरे न हुए थे कि वह भी जलाकर मार दी गयी। हालांकि अब उसके ससुराल वाले जेल में हैं लेकिन रेखा तो अपने माता-पिता से जुदा हो ही गयी।
अब रेखा के पापा हर मिलने वाले से भरे हुए गले से यही कहते हैं कि रेखा ने ससुराल वालों की लालची प्रवृत्ति मुझे क्यों नहीं बताई? बल्कि, जब-जब वह यहां आयी, तब-तब उसकी मां ने उसकी गिरती हुयी सेहत के बारे में पूछा भी। तो उसने कभी कुछ नहीं कहा। परंतु न जाने उसने ऐसा क्यों किया?
आखिर रेखा ने अपने माता-पिता को अपनी परेशानी क्यों नहीं बताई? इसका कारण एकदम साफ है। उसका विश्वास रहा होगा कि एक न एक दिन ससुराल वालों का रवैय्या उसके प्रति अवश्य बदल जायेगा। इसके अलावा वह अपनी रक्षा अपनी परेशानी बताकर, अपने माता-पिता को भी दुखी करने से बचती रही होगी।
भुक्तभोगियों के नाम बदलकर वर्णन की गयी यह सत्य घटना क्या इस ओर संकेत नहीं करती कि दहेज के भूखे भेडिय़ों को अच्छा सबक सिखाने में समर्थ रेखा असमय इसलिए मर गयी क्योंकि उसे अपने ससुराल वालों के सुधर जाने का भरोसा था।
दहेज के लिए होने वाली मौतों के पीछे यही दोनों कारण प्रमुख होते हैं। अत: यदि आपको भी ससुराल में प्रताडि़त किया जा रहा है तो इसकी सूचना अपने माता-पिता को अवश्य दें, क्योंकि वे आपके जन्मदाता तथा पालन-पोषकणकर्ता हैं। इस कारण आपकी शादी हो जाने के बाद भी आपके प्रति उनका दायित्व किंचित भी कम नहीं हो जाता। हालांकि आपके दुखों को जानकर उन्हें भी दुख होगा, तो भी आपके दुखों को दूर करने की क्षमता पति के प्रताड़क होने की वजह से सिर्फ माता-पिता में ही बचती है। अत: उनके दुखी होने की चिंता न करते हुए अपना दुख उन्हें बेहिचक सुनायें।
अगर आप अपनी लड़ाई में स्वयं सक्षम हैं तो भी अपने माता-पिता को उसमें भागीदार बनाने से न चूकें क्योंकि जिंदगी के टेढ़े मेढ़े रास्तों का अनुभव आपसे ज्यादा उनके पास है।
दहेज के लिए प्रताडि़त होना भाग्य या किस्मत की विडंबना नहीं है। यह तो समाज के चंद मुफ्तखोरों की सनक है, अत: इन दुष्ट सनकियों से संघर्ष करना ही सच्चा धर्म है।
प्रताडि़त होने के बाद आप अपने पति से अलग रहने लगती हैं। इस कारण कुछ दिन व्यतीत होने के बाद सास-ससुर व पति के व्यवहार में नरमी आ जाती है। इस स्थिति में अब उन्हें सहयोग तो करें किंतु तभी यदि उनके रवैय्ये में पूर्व बदलाव हो।
बदल जाने का पुख्ता विश्वास हो जाने से पहले आप न तो उनकी चिकनी-चुपड़ी बातों में आयें और न ही उन पर विश्वास करें क्योंकि लालची आदमी अपना कुरूप चेहरा छिपा तो सकते हैं परन्तु बदल नहीं सकते। हो सकता है कि उनकी मीठी-मीठी बातों में आपको फंसाने की कोई नयी चाल हो।
- राजेन्द्र चतुर्वेदी

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