व्यक्तित्व में चार-चांद लगाती है साड़ी

व्यक्तित्व में चार-चांद लगाती है साड़ी

साड़ी विश्व के प्राचीनतम महिलाओं के वस्त्रों में मानी जाती है। भारत में वेशभूषा के विकास क्रम पर नजर डालें तो पुरातन काल से ही साड़ी भारतीय स्त्रियों की वेशभूषा के रूप में लोकप्रिय दिखाई देती है। देश के हर प्रांत में किसी न किसी रूप में साड़ी पहनने का प्रचलन रहा है। कुकुरमुत्ते की तरह सैंकड़ों फैशनों ने जन्म लिया और कुछ दिन अठखेलियां कर दम भी तोड़ दिया लेकिन साड़ी सदाबहार मौसम की तरह ज्यों की त्यों इठलाती हुई लोकप्रियता प्राप्त करती रही।
अपनी सरल बनावट के कारण ही साड़ी नारियों के मन की साम्राज्ञी बनी हुई है। इसे तैयार करने में न तो कोई सिलाई-कटाई की ही आवश्यकता होती है और न ही किसी विशेष डिजाइन की ही। 'खरीदिए और पहनिये' की सरलता ने ही साड़ी को एक युग से दूसरे युग तक के अंतराल को पार कराया है। साड़ी की इतनी किस्में होती हैं कि गिनते-गिनते थक जाएंगी पर पूरी गिनती नहीं हो सकती।
बनारस की जामदानी, ब्रोकेड, पानोतर, बांधनी, टिशू सिल्क, ओरगेन्जा, कोबरा सिल्क साडिय़ों ने जहां नारियों के मन को मोह रखा है वहीं दूसरी ओर दक्षिण भारत की परम्परागत चन्देरी, पटोला, क्रेप सिल्क, बटरसिल्क तथा टसरसिल्क साडिय़ों ने भी नारियों के तन की शोभा को बढ़ाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी है।
साडिय़ों की भिन्नता में कॉटन तथा सिंथेटिक साडिय़ों के विषय में चर्चा करना आवश्यक होगा क्योंकि इन दोनों बहनों ने न जाने कितनी ही नारियों के तन-मन पर अपना आधिपत्य जमा रखा है।
कॉटन के परिधानों को लेकर ऐसी धारणा आमतौर पर लोग बना लेते हैं कि ये तो सिर्फ गर्मियों के मौसम के लिए ही ठीक हैं या सिर्फ शाम को घूमने के लिए ही ठीक है या फिर घरेलू प्रयोग में ही इसे लाया जा सकता है परन्तु यह धारणा गलत है।
कॉटन की साडिय़ां जहां स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से अति उत्तम होती हैं, वहीं इन्हें हर मौसम व हर अवसर पर पहन कर जाया जा सकता है। रसोई घर में तो यह साड़ी नारी की सभी प्रकार से रक्षा करती है।
मौसम के अनुकूल साडिय़ों के रंगों का चयन करना भी स्वास्थ्य के लिए अनुकूल होता है। गर्मियों के मौसम में सफेद, लेमन येलो, स्काई ब्लू, क्रीम कलर, ऑफ व्हाइट, गोल्डन और कॉपर शेड्स अच्छे लगते हैं जबकि सर्दियों के मौसम में गहरे रंग व बड़े प्रिन्टों की साडिय़ों का चुनाव ठीक रहता है। बरसात के मौसम में ध्यान रखना चाहिए कि बादल खुले हों तो हल्के रंग के परिधान ही पहनें अन्यथा बारिश के छीटों से उन पर धब्बे पड़ सकते हैं।
साड़ी के रंग का चुनाव करते समय अपनी त्वचा के रंगों को ध्यान में रखना चाहिए। यदि आप सांवली हैं तो छोटे प्रिंट के हल्के रंग के कपड़ों का ही चयन करें लेकिन यदि आप गोरी-गोरी त्वचा वाली हैं तो आप पर गहरे और हल्के दोनों रंग ही फबेंगे।
अगर आप ठिंगनी हैं तो आप निश्चित रूप से लेमन येलो कलर की छोटी प्रिंट साडिय़ों का ही इस्तेमाल करें। इससे आपकी लंबाई बढ़ी हुई और व्यक्तित्व आकर्षक लगेगा।
मोटी औरतों के लिए क्रीम कलर, ऑफ व्हाइट और गोल्डन शेड्स वाले मोटे पिंरट की साडिय़ों का इस्तेमाल मोहक व आकर्षक होता है। दुबली औरतों के लिए स्काई ब्लू कलर की साडिय़ां छोटे पिंरटों में अच्छी होती हैं।
कामकाजी महिलाओं में जिनका कद लंबा और बदन छरहरा हो, उन पर प्लेन साड़ी और उसी से मैच खाता ब्लाउज खूब खिलता है। साड़ी लाइट कलर, हल्के फ्लावर टाइप पिंरट या मीडियम लाइट कलर में अच्छी रहेगी। यदि कामकाजी महिला छोटे कद की हो तो उन पर प्लेन में मीडियम कलर अथवा मीडियम डार्क कलर एवं टसर कलर पर ब्लैक पिंरट व ब्लैक पल्लू की साड़ी अधिक खिलती है।
साड़ी की इस विविधता का परिणाम है कि यह अब सिर्फ भारतीय ही नहीं बल्कि अनेकानेक पश्चिमी देशों की महिलाओं में भी लोकप्रिय होती जा रही है।
विदेशों में तो आज साडिय़ों पर फैशन के नाम पर कई प्रयोग भी किए जा रहे हैं परन्तु यह सपाट स्वरूप वाला वस्त्र जितना लोकप्रिय हुआ है उतना प्रयोगात्मक स्वरूप नहीं हुए। यही कारण है कि कालचक्र के अनेक झंझावातों के आने पर भी न तो साड़ी के स्वरूप में ही कोई परिवर्तन हुआ और न ही इसकी लोकप्रियता में कोई कमी आ सकी है।
- पूनम दिनकर

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