क्यों बहाती हैं महिलाएं बात-बात पर आंसू

क्यों बहाती हैं महिलाएं बात-बात पर आंसू

सच तो यह है कि पुरूषों की अपेक्षा स्त्रियां कहीं ज्यादा भावुक होती हैं और वे उनकी तुलना में शीघ्र ही आंसू बहा देती हैं। कई बार तो वे जिद्दी बच्चों की भंाति रोकर अपनी हर बात मनवाने के लिए आंसू रूपी हथियार प्रयोग में लाने में कोई संकोच नहीं करती हैं। यह बात अलग है कि स्त्रियों के रोने के पीछे कई कारण होते हैं।
विपरीत परिस्थितियों में पुरूष तो धैर्य रख लेते हैं लेकिन महिलाएं स्वयं पर संयम हरगिज नहीं रख पातीं और उनका करूण क्रंदन शुरू हो जाता है। स्त्रियां स्वाभाविक तौर पर कोमल व सहृदयी होती हैं लेकिन जरा सा भी बोझ या तनाव की स्थिति बनने पर वे शीघ्र ही टूटने लगती हैं हालांकि रोने से मन हल्का अवश्य हो जाता है।
महिलाओं के अधिक रोने का कारण उनका संवेदनशील होना भी है। महिलाएं अक्सर कल्पनाओं में खोई रहती हैं। मानसिक और शारीरिक दु:ख वे हरगिज नहीं सह सकती। उन्हें जब भी कोई ठेस पहुंचाता है या उनके विश्वास के साथ धोखा करता है तो उनका रोम-रोम व्यथित हो उठता है और आंखें भर आती हैं। वे प्राय: अपने हर दु:ख को बदकिस्मती से जोड़ कर देखने की आदी होती हैं।
परिवार में हर व्यक्ति का अपना अलग अलग व्यवहार होता है और वे चाहती हैं कि सभी उससे, उसके अनुरूप व्यवहार करें तो यह नामुमकिन सा होता है और वे आपसी तालमेल व सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाती हैं। वे जरा सा मनमुटाव चाहे पति से, देवर से, सास ससुर से यहां तक कि अपने युवा बेटे-बेटी से भी होने पर अपना धीरज दांव पर लगा देती हैं। बस, इस तनाव से मुक्त होने के लिए ही वे रो पड़ती हैं।
हमारा समाज शुरू से ही स्त्री को अधीन रखता आया है। वह चाहकर भी अपनी इच्छा के अनुरूप कोई कार्य नहीं कर सकती। परिवार के अन्य सदस्यों की उन्हें राय भी लेनी पड़ती है, फिर भी कभी-कभार ऐसी बातें घट जाती हैं कि वे सहन नहीं कर पाती और स्वयं को अकेला व असहाय समझने लगती हैं। तब इस बेबसी के आलम में आंसुओं के सिवा होता भी क्या है?
आज भी स्त्रियां रूढि़वादी समाज की ही शिकार हैं भले ही वे ग्लैमर की चकाचौंध में खो गयी हों या फिर अपने को प्रगतिशील समझती हों। शिक्षा व आत्मनिर्भरता होने के उपरांत भी उनकी सामाजिक व पारिवारिक स्थिति में कोई अधिक अंतर नहीं आया है। निराशा और तिरस्कार तो उनके जीवन के अभिन्न हिस्से हैं।
आज भी अधिकतर महिलाओं की दुनिया सिर्फ घर की चारदीवारी तक ही सीमित है। उन्हें पुरूषों जितनी खुली स्वतंत्रता नहीं है। वे सहनशीलता की प्रतिमूर्ति बनकर चुपचाप सब कुछ सह जाती हैं लेकिन यही पीड़ा आंसू के रूप में ही बाहर आ जाती है।
हालांकि रोना कोई अच्छी बात नहीं है, रोने से नेत्र ज्योति ही कमजोर होती है लेकिन फिर भी उसकी कमजोरी की अभिव्यक्ति आंसुओं के ही रूप में होती है! काश! स्त्री इतनी कमजोर न होती तो कितना सुखद होता।
- चेतन चौहान

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