सम्मान व प्यार - सुखी दांपत्य के आधार

सम्मान व प्यार - सुखी दांपत्य के आधार

समाज ने जो बंधन अपने ढांचे को व्यवस्थित रखने के लिए बनाए थे, उनकी पकड़ ढीली होने से वैवाहिक बंधन निभाना कठिन होता जा रहा है। यही कारण है कि दिन-प्रतिदिन तलाक के मामले तीव्र गति से बढ़ते जा रहे हैं।

युवक एवं युवती विवाह का अर्थ सिर्फ शारीरिक संबंध को बनाये रखना ही समझते हैं। आज की युवा पीढ़ी में 'विवाह' शब्द का अर्थ 'शारीरिक मिलन' तक ही सिमट कर रह गया है।

हर किसी में कुछ न कुछ कमी रहती ही है। कोई भी अपने आप में सम्पूर्ण नहीं होता। अपने-अपने पारिवारिक परिप्रेक्ष्य के कारण कुछ न कुछ वैचारिक मतभेद होते हैं। इसी कारण साथी के प्रति सहनशील होने की आवश्यकता होती है। रोमानी प्यार में केवल कुछ समय के लिए ही विवाद खत्म हो सकते हैं, हमेशा के लिए नहीं।

वैवाहिक जीवन में मतभेद तो होंगे ही उन पर सीधी बहस भी होगी परन्तु वह सभ्य तरीके से ही होनी चाहिए। इस बहस में दोषारोपण करते हुए यह कहना कि तुम हमेशा ऐसा ही करते हो, बात को अधिक बिगाड़ देता है। 'हमेशा' शब्द के प्रयोग से बचना चाहिए।

हर किसी में कुछ-कुछ कमज़ोरी होती है। उस कमजोरी पर चोट करना बहुत घातक होता है। अपने साथी को इतनी चोट न पहुंचाएं कि वह निरूत्तर ही हो जाए। यह जीत की नहीं बल्कि हार की निशानी होती है।

हर आदमी में सराहना की एक प्रबल भूख होती है। पेट एवं सेक्स की भूख के बाद इसी का नम्बर आता है। अच्छे कार्यों की प्रशंसा उत्साह भरती है और संबंधों को मधुर बनाती है, अत: पति तथा पत्नी दोनों को ही इस विषय में एक-दूसरे के उदार भाव का प्रदर्शन करना चाहिए।

अधिकांश दंपति अपने साथी से बहुत अपेक्षाएं रखते हैं जो न तो कभी पूरी होती हैं और न ही कभी पूरी हो सकती हैं। साथ ही यह भी आशा रखते हैं कि साथी स्वत: ही उनकी इच्छाएं जान कर उनकी पूर्ति करे। यह सही तरीका नहीं है। व्यस्तता में कई बातों का ध्यान नहीं रहता, अत: व्यर्थ में मुंह फुलाने से कुछ हासिल नहीं होता। वास्तविकता का अर्थ है, साथी को वैसा ही स्वीकार करना जैसा वह है, न कि जैसा आप चाहते हैं।

संतुलन को बनाये रखने के लिए आपसी समझदारी की भी आवश्यकता होती है। गलत या अपने मन के इच्छानुसार काम न होने पर एकाएक रोष में नहीं आना चाहिए। किसी भी घटना पर अपनी प्रतिक्रि या व्यक्त करने से पहले कुछ क्षण रूककर दूसरे के दृष्टिकोण को समझ लेना चाहिए। इससे बात बिगडऩे की बजाय संभल सकती है।

गलत रोष उत्पन्न करना नाहक परेशानी में डाल सकता है। किसी का गुस्सा किसी पर, खास करके बच्चों पर नहीं उतारना चाहिए। अगर साथी से कोई शिकायत हो तो उसे वाक्युद्ध करके निबटा लेना ही बेहतर है क्योंकि कुढ़ते रहना सेहत के लिए अत्यन्त ही हानिकारक होता है। इसे ध्यान में अवश्य रखें कि कहने का 'ताव' है तो सुनने का भी 'ताव' होना चाहिए वरना बात बिगड़ सकती है।

सही समय पर सही काम करना बहुत महत्त्व रखता है। जब साथी परेशान हो, खराब मूड में हो, उस समय विस्फोटक विषय पर चर्चा करने से माहौल बिगड़ सकता है। अगर साथी को समय पर प्रोत्साहित किया जाए, समय पर प्यार दिया जाए और समय पर ही उसकी गलती का अहसास कराया जाए तो विवाह का बंधन मजबूत होता है। अपने साथी के मनोभावों को पढऩे की क्षमता पति-पत्नी दोनों में ही होनी चाहिए।

विवाह की सफलता सेक्स संबंधों पर भी आधारित होती है। पेट की भूख की भांति सेक्स की भूख भी मनुष्य को व्याकुल कर देती है। पति एवं पत्नी की सहभागिता इसमें समान रूप से होनी चाहिए। पति को पत्नी की इच्छाओं का तथा पत्नी को अपने पति की इच्छाओं का ध्यान रखना आवश्यक होता है। इस प्रकार का ध्यान न रखना वैवाहिक संबंधों में समरसता को दूर करना होता है।

विवाह एक प्रगाढ़ रिश्ता है जिसे सदाबहार बनाये रखने के लिए आपस में प्यार रूपी सिंचाई की अत्यधिक आवश्यकता होती है। सामान्य वैवाहिक जीवन में आपसी समझदारी, सहनशीलता, क्षमाशीलता, धैर्य व प्रेम की परम आवश्यकता होती है। इसके अभाव में समस्याएं बढ़ती है और संवादहीनता की स्थिति आ जाती हैं। पति एवं पत्नी दोनों ही इंसान होते हैं। उन्हें सुरक्षा की आवश्यकता होती है। सुरक्षा और सम्मान के साथ किया जाने वाला प्यार वैवाहिक जीवन के उद्यान को आजीवन हरियाली प्रदान करता रहता है।

-पूनम दिनकर

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