पति-पत्नी की खट्टी-मीठी शिकायत

पति-पत्नी की खट्टी-मीठी शिकायत

- बहाना बनाना और बेवकूफ बनाना कोई इनसे सीखें। हमारे रिश्तेदारों के आने की खबर से कब और कहां दर्द हो जाएगा अथवा कौन सा बाहरी काम निकल आएगा, यह कहना मुश्किल

है।

- इनकी जासूसी और तर्क के आगे तो बड़े-बड़े जासूस भी गच्चा खा जाएं। कहां-किसके साथ, क्यों, कब का जवाब देते समय सावधान रहना पड़ता है। बगल वाले शास्त्री तो समय से घर आ गए थे। आपको देर क्यों हुई। रास्ता तो एक ही है?

- इनका मायका पुराण या पापा चाहते हैं, भैया कहते हैं, सुन-सुन कर कान पक जाते हैं। यह जिंदगी का सबसे बोरिंग अध्याय है।

- जाने कहां-कहां से रेसिपीज बटोर कर पति पर आजमाना इनका बड़ा प्यार सा खतरनाक शौक है और फिर उम्मीद यह कि पति तारीफ भी करे।

- जन्म दिन या सालगिरह भूल जाने पर इतनी इमोशनल क्यों हो जाती हैं? हर साल तो आती है। यदि भूल गए तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ा।

- बात मनवाने का इनका बड़ा ही प्रभावशाली अस्त्र हैं आंसू जो हमेशा गंगा-जमुना की तरह आंखों में भरे ही रहते हैं।

- पड़ोसी या अपनी कलीग से पति की तुलना करना इनकी दिनचर्या में शामिल है। कुछ कहो तो बाल की खाल निकाल कर रख देती है।

- दिन भर दुनियांभर की चकल्लस होती रहती है लेकिन पति के पास बैठते ही बात घूम-फिर कर पैसों पर क्यों आ जाती है, समझना बड़ा मुश्किल है।

पत्नी की शिकायतें

- ऑफिस जाने वाले पतियों को मोजे, घड़ी, रूमाल जैसे चीजों के लिए पत्नी की मदद चाहिए। अपने माता-पिता के आदर्श बेटे कहलाते हैं पर शादी के बाद इनका फर्ज इतना रह जाता है कि पत्नी से पूछते रहें, अम्मा-बाबू जी ने खाना खा लिया। उन्हें दवा दे दी, डॉक्टर से बात कर ली, उनका चश्मा ठीक करवा दिया आदि-आदि।

ऑफिस में काम ये करें, जी हुजूरी हम बजाएं, जरा मेरी डायरी से एक नंबर देना, जरा अमुक फाइल से फलां एड्रेस देना और अगर फोन उठाने में देर हो गई तो कहां गई थी, किसके साथ बिजी थी जैसे हजार सवाल घर आते ही दाग देंगे।

- पति महोदय टीवी का रिमोट हाथ में ले लेते हैं और पत्नी को भी बड़े प्यार से पास बैठा लेते हैं। अब ये चैनल बदलते रहेंगे और आप उनका चेहरा देखती रहिए। जिस मिनट आपने कुछ देखना शुरू किया कि प्रोग्राम को बकवास कहकर चैनल बदल दिया जाएगा।

- अपनी स्मार्टनेस को लेकर काफी गलतफहमी का शिकार रहते हैं। सोचते हैं कि पड़ोसी की बीवी इन पर फिदा है भले ही तोंद बड़ी हो और सिर के बाल नदारद हो।

- शादी से पहले सभ्य-सुसंस्कृत या शेयरिंग-केयरिंग होते हैं लेकिन शादी के बात तो बस, पति के अधिकार ही याद रह जाते हैं। 'मैं' जरा ज्यादा ही बड़ा हो जाता है।

- तर्क में यदि पत्नी सही नजर आती है तो भी हार मानना गवारा नहीं बल्कि सुनने को मिलता है चार पैसे क्या कमाने लगी, बात-बात पर बहस करने लगी हो।

- बर्थ डे या खास दिन भूल जाना इनकी आदत में शुमार है। यदि पत्नी ने नाराजगी जाहिर कर दी तो मनाना तो दूर काम का ऐसा बहाना बनाते हैं कि बेचारी पत्नी अपराधबोध से घिर जाती है।

- जे.के. शास्त्री

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