केवल वर्क-मशीन नहीं हैं आप

केवल वर्क-मशीन नहीं हैं आप

बाली जो भी अच्छी चीज पकाती, बच्चे और पति सब चट कर जाते। उससे इतना न होता कि थोड़ी सी कटोरी में अपने लिये रख ले। लस्सी बनाकर मेज पर रखती। जब तक काम निपटाकर आती, जग खाली मिलता। सोचती बच्चों ने, पति ने पी ली, मुझे तृप्ति मिल गई। यही हाल फल दूध का होता।

पड़ोस की साधना बजाज से वो अपने को बहुत सुपीरियर समझती। 'मैं घर में रहकर घर भर की सेवा करती हूँ और एक यह हैं जिन्हे अपने शौक पूरे करने से फुर्सत नहीं। रॉयल बुलेटिन की नई एप प्ले स्टोर पर आ गयी है।royal bulletin news लिखे और नई app डाउनलोड करें

साधना को अपने लिये भी जीना आता था। यह नहीं कि वो पति और बेटे की उपेक्षा करती थीं। उनका वे पूरा ख्याल रखती और वे भी खाते पीते, उसे जरूर कहते कि वो भी साथ में पिये खाये पिये। बेटा प्रवीण कुछ भी खाने से पहले जरूर पूछता 'मम्मी आपने लिया।' जो अपनी केयर स्वयं करती हैं, उनकी केयर दूसरा भी करेगा लेकिन जिसे शहीद बनने का ही शौक हो तो फिर जिए या मरे। सबको सब कुछ समय से मिलता रहे, बस ऐसी मां और पत्नी को बच्चे और पति भी 'टेकन फॉर ग्रान्टेड' मान कर चलते हैं।

सेहत है तो सब कुछ है। हमेशा शरीर ही काम आता है। दूसरा कोई कुछ समय ही करेगा, फिर कन्नी काट लेगा। इसलिए प्रॉपर भोजन करना और आराम के समय आराम करना जरूरी है। सारे काम का ठेका केवल आपका ही नहीं। जितना शरीर झेल सकता है उतना ही करें। बाकी महरियों से काम लिया जा सकता है लेकिन हर समय की नौकरानी न ही रखें तो अच्छा।

मन सदाबहार जवान रह सकता है भले ही तन बूढ़ा हो। मन अगर जवानी में ही बूढ़ा हो जाए तो जीवन ही बेकार लगने लगता है। आजकल तो जवानी बरकरार रखने के लिए तरह-तरह के नुस्खे आजमाए जाते हैं। अच्छा दिखना, सुन्दर लगने के लिये प्रयत्न करना कोई बुरी बात नहीं बल्कि बुझे मन वाले ऐसे लोगों से प्रेरणा ले सकते हैं।

अपने शौक को मारिए मत। अपनी प्रतिभा को नष्ट न होने दें। वक्त निकलेगा, बस मन में दृढ़ता होनी चाहिए। अपने से प्यार करने में कोई बुराई नहीं है। वास्तविकता तो यह है कि ये ही शुरूआत है औरों से प्यार करने की। अपने से प्यार करने पर ही सच्चे मन से आप सेवा करेंगी केवल फर्ज समझकर ही नहीं। जिम्मेदारी जरूर उठायें। फर्ज निभाएं लेकिन अपने को मिटाकर नहीं क्योंकि जिन्दगी आपको भी औरों की तरह एक बार ही मिली है। थोड़ा सा मनोरंजन, थोड़ा सा आलस्य, थोड़ी कोताही ( बगैर अपराध बोध के ) आपका हक है। और लोग भी कभी कॉम्प्रोमाइज कर सकते हैं, हमेशा आप ही नहीं। याद रखें, दबने वाले को सब दबाते हैं, अपने शोषण के लिए आप स्वयं भी कभी-कभी जिम्मेदार होती हैं। देवी बनने की कोशिश में कही ऐसा न हो कि आप मानवी भी न बन पाएं। केवल वर्क मशीन नहीं हैं आप, याद रखें।

- उषा जैन 'शीरीं'

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