आधुनिक जीवन-शैली की महामारी है हताशा

आधुनिक जीवन-शैली की महामारी है हताशा

हम जैसा चाहते हैं, घटनाएं वैसी घटती नहीं और कोई भी व्यक्ति यह जानने का प्रयत्न ही नहीं करता कि हमारी उदासी का मूल कारण भी हमारी अपेक्षाएं ही हुआ करती हैं। जैसा हम चाहें, वैसा ही हो, यह कतई संभव नहीं है। हमारे जीवन में जो घटनाएं घटती हैं, उसके लिए हमारे विचार और कृत्य भी जिम्मेदार हों, ऐसी बात नहीं है। कुदरत की अपनी गति है जिसके अनुसार ही घटनाएं घटती हैं। वह यह परवाह नहीं करती कि वह आपके लिए सुविधाजनक है या नहीं? यह जानते हुए कि जो हम चाहते हैं, वह होगा नहीं, फिर भी उसकी अपेक्षा करना ही हमारी हताशा का मूल कारण होता है। हताशा एक ऐसा भाव है, जिसमें उदासी की गहरी पर्त होती है और वह कोई भी काम करने की प्रेरणा नहीं देती। इसी स्थिति में ऊब और घुटन का अनुभव होता है और काम में मन नहीं लगता। जीवन रसहीन लगने लगता है। काम के बोझ से दबे कुचले महसूस करते हैं। बात-बात में क्रोध का ज्वालामुखी फूट उठता है, भयभीत रहने लगते हैं। हर समय अशांत रहने लगते हैं। इन स्थितियों में उमंगें व मुस्कुराहटें साथ छोड़ चुकी होती हैं और यह स्थिति अन्य लोगों से तोड़कर बिलकुल अकेला बना डालती हैं। इस अवस्था को 'डिप्रेसिव साइकोसिस' कहा जाता है।

हताशा एक मानसिक बीमारी है, जो औषधियों एवं आधुनिक चिकित्सा प्रयोगों से दूर नहीं हो सकती, क्योंकि चिकित्सा विज्ञान इन सब कारणों की जड़ में नहीं उतरता। चिकित्सक जो दवाई देते हैं, वह मस्तिष्क के तंतुओं को प्रभावित करती है और उससे कुछ रसायनिक परिवर्तन होते हैं। इससे मिजाज में थोड़ा बहुत बदलाव अवश्य हो सकती है लेकिन इससे इस समस्या का मूल कारण नष्ट नहीं होता। हताशा आधुनिक जीवन की एक बड़ी त्रासदी है। दरअसल यह बीमारी हमारे देश की उपज नहीं है। यह सम्पन्न एवं विकसित देशों की बीमारी है। पाश्चात्य देशों ने धन को ही जीवन का अंतिम लक्ष्य माना है जबकि हमारे देश में विभिन्न धर्मों ने इतने आयाम दिये हैं कि धन कमाने के बाद भी आगे बढऩे के अनेक मार्ग खुले होते हैं। इस देश में जीवन का अंतिम लक्ष्य धन नहीं बल्कि प्रसन्नता को ही माना है, जिस सत्य की खोज में हम हजारों साल से जुटे हैं।

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हजारों साल की खोज एवं साधना के बाद जो प्रसन्नता रूपी अमृत हमें मिला है, आज हम उसकी उपेक्षा कर रहे हैं। यह मानव का स्वभाव है कि जो वस्तु उसके पास नहीं है, उसे ही वह पाना चाहता है और जो है, उसका उपयोग नहीं करता। हताशा भविष्य के प्रति अनिश्चितता के दृष्टिकोण के कारण ही पनपती है। न अच्छी नौकरी, न अच्छा जीवन साथी, न भरपूर धन, न चमकती सफलताएं-कुछ भी नहीं और बस, हम हताशा से घिर जाते हैं। ज्यों-ज्यों उम्र ढलती जाती है, हमारी हताशा परवान चढ़ती जाती है। ढलती हुई उम्र के साथ यह साफ होता है कि कोई भी चीज तसल्ली एवं संतोष नहीं देगी। तनाव, बेचैनी, उदासी, अवसाद आदि जितने मानसिक अथवा आंतरिक दु:ख हैं, वे सभी हताशा के ही परिणाम होते हैं। सबके मूल में हताशा ही होती है। यह बीमारी अन्य शारीरिक बीमारियों को जन्म देती है। वजन कम होना, भूख गायब होना, नींद न आना, ब्लडप्रेशर का असंतुलन, सिरदर्द, पेचिश, चक्कर आना आदि कई उपसर्ग हताशा के प्रकोप के कारण ही हो जाते हैं। जीवन एक संग्राम है। इस संग्राम में भाग लेने वाला व्यक्ति ही जय और पराजय को झेलता है। जब 'जय' हमारे हिस्से आ सकती है तो 'पराजय किसके हिस्से जाएगी? नदी के दो पाटों की तरह सुख और दु:ख दोनों ही जीवन के साथ चलते हैं। सुख का परिणाम हमें अच्छा लगता है, परन्तु दु:ख का परिणाम बुरा, ऐसा क्यों? अक्सर लोग कमी की ओर ही देखा करते हैं। हम अपने गुणों को देखकर अपने को शक्तिशाली भी अनुभव कर सकते हैं या केवल अपनी कमजोरियों पर ध्यान जमाकर अपने को शक्तिहीन भी मान सकते हैं। मानसिक शांति को बनाये रखकर श्रम से जो प्राप्त हुआ, वही हमारा अंश है, मानकर चलने वाला ही आज का सबसे बड़ा संपन्न व्यक्ति होता है। यह तो निश्चित ही है कि हताशा आधुनिक जीवन शैली की महामारी है क्योंकि आज के समय में हम सभी कुछ 'फास्ट' करना चाहते हैं। 'फास्ट फूड', 'फास्टलाइफ', 'फास्टवाइफ' अर्थात् वैश्यागमन आदि के चक्कर में फंसकर अपने को फास्ट बनाते जा रहे हैं। ऐसी स्थिति में 'डिप्रेसिव साइकोसिस' से हम ग्रसित रहकर 'फास्टली' मृत्यु रूपी हताशा की गिरफ्त में फंस रहे हैं तो यह दोष किसका? मन की चंचलता और असंतुलन को संतुलित कर हम 'हताशा' रूपी महामारी के चुंगल से मुक्त हो सकेंगे।

- आनंद कुमार अनंत

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