वाइफ एक्सचेंज - एक घिनौनी प्रथा

वाइफ एक्सचेंज - एक घिनौनी प्रथा

हमारी आधुनिक संस्कृति में सम्पन्न समझे जाने वाले तबकों में 'वाइफ एक्सचेंज' की प्रथा बहुत ही तेजी से पनपती जा रही है। यह प्रथा धीरे-धीरे मध्यमवर्गीय लोगों में भी पनपने लगी है। भारतीय समाज के लिए यह पनपती प्रथा जहां चिंताजनक बात है, वहीं दूसरी ओर इससे स्वस्थ समाज बड़ी तेजी से अस्वस्थता के गड्ढ़े में भी गिरता जा रहा है।

काम अर्थात् सेक्स प्राणी मात्र के लिये एक प्राकृतिक उपहार है। इसके बिना नवीन सृजन की कल्पना तक नहीं की जा सकती है। पति-पत्नी के मध्य प्रचलित काम भाव को ही शास्त्रों में स्वच्छ भाव बताया गया है परन्तु जब यही भाव पति-पत्नी की लक्ष्मण रेखा को पार करके पुरूष-स्त्री तक बढ़ जाया करता है तो उसे 'अवैध संबंध' की संज्ञा दी जाती है।

भारतीय समाज के मध्य एक ऐसा ही समाज है जो शारीरिक अवैध संबंध को मात्र क्रीड़ा (खेल) मानकर खेलते रहते हैं। उनके अनुसार कोई भी स्त्री-पुरूष किसी के साथ भी स्वच्छंदता पूर्वक अपने दैहिक भूख को शांत करके अपने अनुसार जीवन को बिताने के लिए स्वतंत्र होते हैं। इस विचार को मानने वाला वर्ग अपनी पत्नी को मित्र के पास शैय्यासंगिनी बनने के लिए बेहिचक भेज रहा है।

हाल ही में एक ऐसी ही घटना का उद्भेदन हुआ है जिससे यह पता चला कि आज के समय में एक पुरूष अपनी पत्नी को दूसरे पुरूष के पास स्वेच्छा से भेजता है तथा प्रथम पुरूष की पत्नी दूसरे पुरूष के पास स्वेच्छा से रात बिताने आती रहती है। एक ऐसा वर्ग जो समाज में सम्पन्न माना जाता है, की पत्नियां अपने पति के मित्रों की बांहों में हर रात बिताने को आतुर रहती हैं।

यह प्रथा भले ही हमारे समाज के लिए घिनौनी प्रथा हो किंतु यह सत्य है कि इस प्रथा को अपनाने वाले युवक युवतियों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि होती जा रही है। इस चलन को अपनाने वाली मृदुला सिन्हा का कथन है कि जिस प्रकार एक सब्जी को रोज खाते रहने से एक दिन ऐसा भी आता है कि उसका नाम सुनते ही भूख मिट जाती है, उसी प्रकार एक पति की अंकशायिनी बनकर रहने से जीवन नीरस हो जाता है। जीवन को सरस बनाये रखने के लिए 'वाइफ एक्सचेंज' तथा 'हसबैण्ड एक्सचेंज' कोई बुरी प्रथा नहीं है। फिर हम लोग दिन में तो अपने अपने घरों में ही रहा करते हैं।

अगर शारीरिक संबंध तक ही पति-पत्नी का संबंध रहता तो विवाह' जैसी पवित्र संस्था का औचित्य ही क्या था? एक युवक की एक युवती के साथ विवाह मात्र शारीरिक संबंध बनाये रखने तक ही सीमित नहीं होता बल्कि सुख-दुख के साथ जीवन की गति को स्वच्छ प्रक्रियाओं द्वारा आगे बढ़ाते रहने के लिए भी विवाह की आवश्यकता होती है। अगर ऐसी बात न हो तो पशु तथा मनुष्य में अन्तर ही क्या रह जाएगा?

सिर्फ क्षणिक दैहिक सुख की प्राप्ति की अभिलाषा में अपनी प्रथाओं, सभ्यताओं का त्याग कर देना क्या घृणित कदम नहीं है? अगर यह कदम घृणित नहीं माना जाता तो समाज में 'विवाह' जैसे पवित्र शब्द का आविष्कार ही नहीं होता। पाश्चात्य देशों की नकल करने वालों को यह सोचना चाहिए कि उन देशों में भी यह प्रथा आम नहीं है।

अत्याधुनिका कहलाने वाली नवब्याहता श्रीमती प्रथा रंजन कहती हैं कि पुरूष अनेक स्त्रियों से शारीरिक संबंध बनाकर भी पवित्र ही माना जाता है किंतु स्त्री अपवित्र हो जाती है। 'अपवित्र' शब्द पुरूषों ने अपने स्वार्थ के लिए ही बनाया है। पुरूष वीर्य की चन्द बूंदों से अगर स्त्री अपवित्र हो जाती है, तो पुरूष 'योनिरस' को ग्रहण कर अपवित्र क्यों नहीं होते?

आज का युवा वर्ग 'विवाह-बंधन' के पवित्र संबंध का अर्थ कुछ भी लगाये, परन्तु यह शत-प्रतिशत सत्य है कि भारतीय समाज में 'एक्सचेंज' (अदला--बदली) प्रथा को कभी भी प्रश्रय नहीं दिया जा सकता। इस घिनौनी प्रथा में मस्त रहने वाले पुरूष-स्त्री स्वयं तो अनेक प्रकार के यौन रोगों से ग्रसित रहते ही हैं, साथ ही समाज को भी अस्वस्थ बना डालते हैं।

'वाइफ एक्सचेंज' प्रथा किसी सभ्य व्यक्ति द्वारा बनायी गई विकसित प्रथा नहीं है बल्कि यह एक ऐसी घिनौनी प्रथा है जो महिलाओं का दैहिक एवं भावनात्मक शोषण-दोहन करने के लिए पुरूषों द्वारा बनायी गयी है।

- आनन्द कुमार अनन्त

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