विधवा-विधुर-तलाकशुदा: क्या हर्ज है एक बार फिर जीने में

विधवा-विधुर-तलाकशुदा: क्या हर्ज है एक बार फिर जीने में

उम्र कोई भी हो, एक हमदर्द और एक दोस्ताना साथ की जरूरत हमेशा होती है-ऐसा साथ जो दु:ख को समझता हो और खुशी में हिस्सेदारी कर सके। जीवन के उतार-चढ़ाव के बीच जो हाथ थाम कर समतल रास्तों को ज्यादा खूबसूरत बना दे।
विवाह के बाद घर की चारदीवारी के बीच जो रिश्ता पनपता है, वह हमारे अन्दर और बाहर की दुनिया को और बड़ा कर देता है। अगर दोनों में तालमेल अच्छा हो लेकिन वह साथ अगर किसी कारण से छूट जाए तो अकेले जीवन को संभालना अक्सर मुश्किल होता है।
वजह चाहे तलाक हो या जीवनसाथी की मृत्यु, अकेले रह जाने का दु:ख जीवन में कहीं न कहीं अधूरेपन को जन्म देता है मगर हमारे यहाँ आज भी दूसरे विवाह को सहजता से नहीं लिया जाता। हमारे समाज में शादी का अर्थ जन्म-जन्म का वह बन्धन होता है जो ईश्वर ने तय किया है। किसी कारण से अपने जीवन साथी से बिछुड़ गए व्यक्ति के लिए नए जीवन की शुरूआत कठिन होती है। आशंका, संकोच और झिझक के साथ-साथ एक खास तरह का अपराध बोध भी मन पर हावी रहता है... कहीं हम गलत तो नहीं कर रहे? नया रिश्ता ठीक तो होगा न? क्या वाकई मुझे फिर से खुशी ढूंढने का हक है? लोग क्या सोचेंगे? ये दबाव इतने ज्यादा होते हैं कि दूसरे विवाह का निर्णय करना मुश्किल हो जाता है।
खास कर महिलाओं के लिए फिर से विवाह आसान नहीं होता। कम उम्र के लिए तो फिर भी स्वीकृति है। 'अभी तो उम्र ही क्या है का तर्क भी साथ में होता है लेकिन अगर बच्चे हैं या उम्र कुछ ज्यादा है तो मान लिया जाता है कि शादी की जरूरत क्या है। बच्चों को बड़ा करें। यही उसकी जिम्मेदारी है और इसी में उसकी खुशी। उसके जीवन में पति की मृत्यु या तलाक के बाद किसी का होना बहुत जरूरी नहीं माना जाता।
यह मानसिकता खुद उस औरत पर भी इतनी हावी होती है कि दूसरी शादी की बात सोचते हुए उसे भी हिचक होती है और दूसरी शादी की बात करने में इतना समय लगा देती है मानो जीवन सौ वर्षों का है? ऐसे में स्वयं निर्णायक होना बहुत अहमियत रखता है
हम जीवन में दुर्घटनाओं के लिए तैयार नहीं होते। खासकर विवाह में किसी भी हादसे को आसानी से स्वीकार नहीं कर पाते फिर चाहे वह तलाक हो या जीवन साथी की मृत्यु। लगता है कि कहीं यह हमारी कमी है या दुर्भाग्य कि हमें इस स्थिति का सामना करना पड़ा।
खुद पर से विश्वास भी उठ जाता है। दोबारा विवाह की बात उठे तो एक खास किस्म का अपराध बोध भी जागता है जैसे हम अपने गुजर गए साथी के साथ बेवफाई कर रहे हों या अगर बच्चे हैं तो उनके साथ ज्यादती कर रहे हैं।
तलाक भी कहीं न कहीं हमें असफल साबित करता है। अक्सर हमारे ही करीबी नजदीकी रिश्तेदार यह एहसास देते हैं कि कोई कमी थी जिसकी वजह से हम अपने विवाह को निभा नहीं पाए। ऐसा बिलकुल भी नहीं है। किसी रिश्ते को बनाने और निभाने में दोनों पक्षों की अहम् भूमिका होती है और ऐसा भी नहीं है कि रिश्ता निभ नहीं पाया तो यह आपकी गलती थी।
कई बार दो लोगों का आपसी तालमेल नहीं बैठता और विवाह असफल हो जाते हैं, इसलिए नए पुन: विवाह में पूरे यकीन से कदम बढ़ायें। अपने पर यकीन हो और देख भाल कर शादी कर रही हैं तो कोई कारण नहीं है कि फिर से विवाह असफल हो। बच्चों के मन में सुरक्षा की भावना लाने के लिए भी यह जरूरी है कि माता-पिता का जीवन खुशियों से भरपूर और संतुष्ट हो।
हमारे संकोच में सामाजिक और मानसिक दोनों ही दबाव शामिल होते हैं, इस कारण अब स्वयं को संकोच से बाहर निकलने का प्रयास करना होगा। तभी हम अपने स्वयं का जीवन सार्थक कर पाएंगे अथवा घुट-घुट एक दिन मृत्यु को प्राप्त हो जायेंगे? इसलिए तमाम ऊंच नीच की बातों में अपने भविष्य के बारे में सोच विचार कर शीघ्रता से लिया गया निर्णय ही महत्त्वपूर्ण साबित होगा। इस प्रकार तलाकशुदा, विधवा, विधुर, अपने जीवन और परिवार को एक बेहतर भविष्य की ओर ले जा सकते हैं।
- जे.के.शास्त्री

Share it
Top